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जीवन की आखिरी सांस तक करता रहूंगा जनसेवा- संतोष यादव

गाजीपुर। मैंने अपने सामाजिक व राजनैतिक जीवन में अनेक संघर्षों व झंझावातों का सामना किया, और जब-जब मेरे जीवन में कठिन समय आया है ईश्वर, गुरू, माता-पिता और शुभचिन्तकों के आर्शीवाद से मेरी ताकत हमेशा दोगुनी हो जाती है। आज पुनः मेरे धैर्य, सेवा, धर्म, की परीक्षा है। परन्तु मै अपने मित्रों-शुभचिन्तकों के साथ ही गाजीपुर की महान जनता से यह कहना चाहता हूं कि मै सर्व समाज के गरीबो, शोषितों, अपमानितों की आजीवन सेवा व संघर्ष करता रहूंगा। जनपद की पावन मिट्टी मेरी मां है, भला कोई मुझे मेरी मां की सेवा करने से रोक सकता है” यह बात ब.स.पा. से निष्कासित सदर विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी संतोष कुमार सिंह यादव ने छावनी लाईन स्थित अपने आवास पर शुभचिन्तकों व समर्थको के बीच  कही। उन्होने अपने निष्कासन पर साफ किया कि मैं 2006 से बसपा का एक ईमानदार कार्यकर्ता के रुप में सेवा किया हूं, मैं बाबा साहब व कांशीराम के चिन्तन से हमेशा प्रभावित रहा हूं। मुझे पार्टी ने विगत विधानसभा में सदर विस से चुनाव लड़ाया और मैं पार्टी के इतिहास में सदर विस में अब तक सबसे अधिक मत 54987 पाने वाला प्रत्याशी रहा। मैं पूरी निष्ठा से पार्टी के प्रत्येक निर्देशों का पालन करते हुए ईमानदारी से चुनाव भी लड़ा। चाहें बाढ़ की विभीषिका रही हो या किसी कार्यकर्ता का सुख-दुख! मैं यथासम्भव सेवा करने की कोशिश किया। चुनाव हारने के बाद पार्टी के बुलाये गये लखनऊ की समीक्षा बैठक, कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस में भी भाग लिया तथा पार्टी द्वारा आयोजित धरने में भी 11 अप्रैल को सरजू पाण्डेय पार्क में पूरे दम-खम से भाग लिया। 12 अप्रैल को मैं सपरिवार पूर्वनिर्धारित एक धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने हरिद्वार चला गया। 14 अप्रैल  को बाबा साहब की जयन्ती में लखनऊ नहीं जा सका। हमें पता चला कि प्रत्येक प्रत्याशी को लखनऊ एक बस लेकर जाना है, चूंकि मैं बाहर था इसलिए कहा कि आप लोग बस कर लीजिए, मैं आकर पैसा दे दूंगा। 16 अप्रैल को हरिद्वार से वापस आ रहा था तभी शाम 7 बजे मीडिया से पता चला कि मुझे पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्तप होने के आरोप में निष्कासित कर दिया गया है, मुझे विश्वास नहीं हुआ मैं तुरन्त जिलाध्यक्ष से मोबाईल द्वारा सम्पर्क किया कि क्या यह सही है मैंने कौन सा इतना बड़ा अपराध किया या अनुशासनहीनता की क्या मुझसे एक बार भी स्पष्टीकरण नहीं मांगा जा सकता था। मुझे मेरी गलती बताकर सुधरने का अवसर नहीं दिया जा सकता था। अभी मैं पांच दिन पहले पार्टी के धरना-प्रदर्शन मे शामिल हुआ, क्या कोई व्यक्ति अपने पूर्वनिर्धारित पारिवारिक अनुष्ठान में भाग नहीं ले सकता, क्या इसके बाद फिर बाबा साहब की जयन्ती नहीं आती, इस पर उन्होनें असमर्थता जाहिर करते हुए इसे ऊपर का आदेश बताया, मैं यह सुनकर हतप्रभ रह गया। क्या यही सिला मिलना चाहिए मेरी निष्ठा और सेवा का। अभी हम चुनाव लड़कर हारे हैं और ऊपर से निष्कासन! मुझे अब तक समझ में नही आया कि मेरे निष्कासन की वजह लखनऊ बस न ले जाना या 11 अप्रैल को दिये गये भाषण हैं। जिसमे मैने कहा था कि “आज दूध पीने वाले मजनूं (चमचा) पार्टी में लाभ ले रहे हैं, तथा खून देने वाले मजनूं (समर्पित कार्यकर्ता) पार्टी की पिछली कतार में हैं, फिर से इनको आगे लाना होगा ”। खैर इसको मैने ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया तथा समझ लिया कि जोनल कोआर्डिनेटर मुनकाद अली को शुरू से ही मैं और मेरा संस्कार पसन्द नहीं आता रहा है। उन्होने जिले के (लंका मैदान) में होने वाले “सर्व धर्म सद्भावना सम्मेलन” के आयोजन का भी विरोध किया था, और बहुत सारी बातें हैं जो वक्त आने पर बताऊॅगा। मैं एकबार पार्टी मुखिया तथा वरिष्ठ नेताओं से मिलकर अपनी बात रखूंगा, यदि मेरी बात मानी जाती है, तो मैं पार्टी के बैनर तले समाज की सेवा करता रहूंगा। मुझे बहन जी से कोई शिकायत नहीं है, यदि मेरे निष्ठा और समर्पण का सम्मान नहीं हुआ तो आगे अपने शुभचिन्तकों, समर्थकों से विचार करके रणनीति बनायेगें, जनसेवा जीवन की आखिरी सांस तक करता रहूंगा इससे कोई मुझे रोक नहीं सकता। इस अवसर पर नंदलाल यादव, गुदरी यादव, शोभनाथ, हिमांशु, वरूण, रमेश, विरेन्द्र, अशोक, सूबेदार, इरफान, अरविन्द, आफताब, नवीन, शेषनाथ, संजय, ओमकार, बबलू सहित दर्जनों समर्थक उपस्थित थे।

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