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बोधिवृक्ष की आयु 96 वर्ष

वाराणसी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र सारनाथ के मूलगंध कुटी बौद्ध मंदिर परिसर में लगे बोधिवृक्ष की दूसरी शाखा की आयु 96 वर्ष हो गई है। यह सारनाथ आने वाले सैलानियों के लिए कौतुहल का केंद्र बना रहता है। श्रीलंका के अनुराधपुर में लगे बोधिवृक्ष की एक शाखा को महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के तत्कालीन  संस्थापक अनागारिक धर्मपाल ने 12 नवंबर 1931 को मंदिर परिसर में लगाया था। जो अब विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। यहां आने वाले बौद्ध बोधिवृक्ष की परिक्रमा व पूजा अवश्य करते हैं। दो वर्ष पूर्व जड़ों के कुछ हिस्से में दीमक लगने से यह बोधिवृक्ष सूखने लगा था। महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के प्रयास से बीएचयू के वनस्पति विज्ञान के वैज्ञानिकों ने इसे संरक्षण देकर सुरक्षित कर लिया। महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव भिक्षु के मेधांतर थेरो ने बताया कि बोधगया में सिद्धार्थ को 35 वर्ष की अवस्था में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसके बाद से उस वृक्ष को बोधिवृक्ष कहा जाने लगा। बोधगया के बोधिवृक्ष के दक्षिण तरफ की एक शाखा की पौध को सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा ने ले जाकर श्रीलंका के अनुराधपुर में रोपित किया। जो आज वहां एक विशाल बोधिवृक्ष के साथ आस्था का केंद्र बना है। उसी बोधिवृक्ष की एक शाखा महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के संस्थापक अनागारिक धर्मपाल ने मंदिर परिसर में लगाई थी। यहां आने वाले बौद्ध पर्यटक वृक्ष से मन्नत भी मांगते हैं। भिक्षु मेंधातर ने बताया कि बोधिवृक्ष के सौ वर्ष पूरे होने पर श्रीलंकाई रीति-रिवाज व मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजा की जाएगी।

 

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