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पहली बार टूटेगी सायंकालीन गंगा आरती की परंपरा

वाराणसी। देश ही नहीं विदेश में बनारस के पहचान बन चुकी रोजाना होने वाली गंगा आरती अपने दो दशक के इतिहास में पहली बार अपने निर्धारित समय सायंकाल को संपन्न न हो कर दोपहर में होने जा रही है। गौरतलब है कि बनारस के दशाश्मेध घाट पर 1997 से सायंकाल नित्य गंगा आरती सम्पादित होती रही है ,लेकिन ऐसा सोमवार को नहीं होगा। दरअसल सावन के अंतिम सोमवार और रक्षाबंधन के साथ ही चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। धर्मग्रंथो के अनुसार ग्रहण सूतक व ग्रहणकाल में स्नान ,देवपूजन,नैवेध अर्पण आदि धार्मिक संस्कार करना निषेध है जबकि जप,भजन,कीर्तन किया जा सकता है। इसके स्पष्ट प्रमाण धार्मिक ग्रंथो निर्णयसिन्धु , ज्योतिषसंग्रह, मुहूर्तचिंतामणी आदि में दिए गये है। गंगोत्री सेवा समिति द्वारा गंगा आरती के संस्थापक पं किशोरी रमन दुबे बाबू महाराज और दिनेश शंकर दुबे ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दोपहर साढ़े 12 बजे आरती सम्पन होगी। ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके मंत्रो का जप करना चाहिए। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई अन्य कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किए गए हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर पुन: स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है। कहीं-कहीं वस्त्र, बर्तन धोने का भी नियम है। पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा जल भरकर पिया जाता है। ग्रहण के बाद दान देने का अधिक माहात्म्य बताया गया है। सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण में तीन प्रहर पूर्व सूतक लग जाता है । सूतक की स्थिति में भोजन नहीं करना चाहिये। बालक , वृद्व और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। देवी भागवत के अनुसार भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये।

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