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इतिहासकार उबैदुर्रहमान ने इतिहास के मूल दस्तावेज से रची गाजीपुर की क्रांति व उर्दू साहित्य के हस्ताक्षर

गाजीपुर। प्रसिद्ध इतिहासकार उबैदुर्रहमान सिद्दिकी गाजीपुर क्रांति‍ व गाजीपुर के उर्दू साहित्‍य विषय पर दो किताबों पर अपनी लेखनी चलायी है। इस संदर्भ में इतिहासकार रहमान साहब ने बताया कि गाजीपुर की क्रां‍ती में 1857 से लेकर 1859 तक के मूल दस्‍तावेज तक का उल्‍लेख किया गया है। गाजीपुर के उर्दू साहित्‍य में मुगल बादशाह शाहजहां से लेकर अबतक जितने उर्दू के प्रसिद्ध साहित्‍यकार हैं उनके बारे में बताया गया है। गाजीपुर की क्रां‍ति‍ के संदर्भ में बताया कि उत्‍तर प्रदेश आरकाईव (इलाहाबाद तथा लखनऊ) से मूल दस्‍तावेजात जो वहां पर थें उसे अपनी किताब में प्रकाशित किया है। जैसे 1857 की क्रांति‍ में अंग्रेजी फौज ने गांव बबेड़ी के प्रतिएक को फांसी पर चढ़ा दिया था। जो बच गये थें और आस-पास के गांव में छि‍पे थें उन्‍हे ढ़ूंढकर उनको सख्‍त-सख्‍त सजाये दी तथा कुछ को पीपल के पेड़, बरगद के पड़ों के डालियों पर फांसी दे दिये। इसके अतिरिक्‍त गांव गहमर, बारा, उसिया, मुहम्‍मदाबाद, कोरंटाडीह में कांतिकारियों के चिंगारियों को दबाने के लिए अंग्रेज शासको ने जिस प्रकार से दमन किया उसका भी सजीव उल्लेख है। इसी प्रकार दूसरी रचना गाजीपुर उर्दू साहित्‍य से संबंधित शाहजहां के समय से अबतक मूल पांडुलिपियों के आधार पर गाजीपुर के उर्दू साहित्‍य का उल्‍लेख किया गया है। इसमे तत्‍कालीन कवियों तथा रचनाधर्मियों से संबंधित उनके काव्‍यग्रंथों तथा उनके द्वारा लिखित कीर्तियों का उल्‍लेख है। विशेष बात यह है कि यह पुस्‍तक पहली बार देवनागरी में प्रकाशित हुई है। इसमे गाजीपुर के शायरों की शायरी का भी उल्‍लेख किया गया है। उदाहरण स्‍वरुप खामोश गाजीपुरी की चंद पंक्तियां देखे-

ऐसे फनकार भी खामोश नजर आते हैं

जिनको हालात की पस्‍ती ने उभरने न दिया

हम गमें दिल भी छुपाना छोड़ दें

तुम कहो तो मुस्‍कुराना छोड़ दें

मयकसी तो हम न छोड़ेंगे मगर

हां कहो तो मुस्‍कुराना छोड़ दें

मै वह सूरज हूं जिसकी न डूबेगी कभी किरण

रात होगी तो सितारों में बिखर जाऊंगा!

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