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भगवान श्रीराम को मनाने पहुंचे भरत, खड़ाऊ लेकर लौटे वापस

गाजीपुर। अतिप्राचिन रामलीला कमेटी हरिशंकरी के तत्वावधान में लीला के आठवें दिन शनिवार को सकलेनाबाद स्थित मनबोध लाल मुख्तार के निकट भारद्वाज मुनि के आश्रम पर श्री भरत आगमन व मननवन, विदाई लीला का मंचन किया गया। बताते चले अयोध्या नरेश चक्रवर्ती महाराजा दशरथ जब श्री राम को बन जाते व अयोध्या वासियों द्वारा जयकारा सुनकर महारानी कैकयी के कक्ष से दौड़ते हुए राम-राम कहते जमीन पर गिर पड़े और गिरते ही महाराज ने अपने शरीर को त्याग दिया। सूचना पाकर कुल गुरू वशिष्‍ठ राजदरबार में आते है और मंत्री सुमन्त से कहते है कि भरत के आगमन तक राज्य का कार्यभार आप देखते रहिए जबकि बताते है जबकि राम वनगमन के पूर्व भरत, शत्रुध्न अपने ननिहाल कैकैय देश गये थे। कुछ दिन के बाद भरत अपने ननिहाल में सोते समय भोर में देखा कि पिता महाराज दशरथ नंगे सर मैले कुचैले कपड़े पहने रथ द्वारा दक्षिण दिशा की ओर जा रहे है वे अचानक घबड़ाते हुए उठते है इतने में शत्रुध्न दौड़े हुए अपने भाई भरत जी के पास आकर पूछते है कि क्या भैया क्यों घबड़ाये हो भरत ने कहा कि हमने पिता बारे में अपसकुन स्वप्न देखा कि पिता जी रथ पर बैठे दक्षिण दिशा के तरफ जा रहे है और उनके पार्थिव शरीर को तेल के कड़ाहे में डाल दिया गया है उधर इतना कहते ही थोड़ी देर में राजदूत श्रीधर को कुलगुरू वशिष्‍ठ कैकैयी देश के लिए वायुवेग से चलने वाला रथ को ले जाने के लिए आदेश देते है। दुसरी तरफ राजदरबार में कुलगुरू वशिष्‍ठ  राज्यवैद्य के निर्देशानुसार महाराज के पार्थिव शरीर को तेल में डालवा दिया। थोड़ी देर में राजदूत श्रीधर रथ द्वारा कैकैय देष के लिए पहुंचते है और भरत ने जब देखा कि अयोध्या से श्रीधर आये हुए है वे झटके से उठकर महाराज के हालचाल के बारे में जानकारी लेते हुए कहा कि अयोध्या में सब ठीक-ठाक है न इतना सुनने के बाद श्रीधर ने गुरू वशिष्‍ठ द्वारा दिये गये संदेश को नाते हुए कहा कि आप दोनो भाईयों को गुरूदेव ने अतिशीघ्र बुलाया है इतना सुनने के बाद दोनो भाई अपने नाना तथा मामा को प्रणाम करते हुए रथ पर सवार होकर अयोध्या के लिए कुच कर जाते है। जब भरत शत्रुध्न का रथ अयोध्या के सीमा पर पहुचता है तो अयोध्यावासी भरत को देखकर मुह फेरते है। इस दृष्‍य को देखकर भरत को संका हो जाता है कि जरूर कुछ दाल में काला है उधर दासी मंथरा आरती का थाल सजाने के लिए महारानी कैकैयी से कहती है और दोनो दरवाजे के गेट पर खड़ा होकर के भरत शत्रुध्न के आने का प्रतीक्षा करती है। भरत का रथ दरबार से होते हुए महारानी कैकैयी के दरवाजे पर पहुचता है। दासी खुश होकर के राजा भरत का अभिवादन करती है जब भरत अंदर जाते है तो माताओं को विधवारूप में देखकर अचंभित हो जाते है और महाराज दशरथ व राम के बारे में माता कैकैयी से पुछते है भरत का उत्तर देते हुए महारानी ने कहा कि महाराज स्वर्ग सिधार गये और राम, सीता, लक्ष्मण वन के लिए चले गये इतना सुनते ही भरत मुक्र्षित होकर जमीन पर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद भरत को होस आता है उधर शत्रुध्न अपने माता सुमित्रा के कक्ष से बाहर आकर कैकैयी के गेट पर दोनो भाई मंथरा के करामातों को सुनकर झोटा घिंचकर लात घूसो से प्रहार किया। भरत जी दयावन होते हुए दासी को शत्रुध्न से दूर हटा देते है। थोड़ी समय बाद भरत अपने पिता के राज्य दरबार में पहुंचते है वहा पर सभी अयोध्यावासी मौजूद रहते है इसी बीच भरत जी आकर राजगद्दी संभालने से पहले सभी नर-नारियों से कहा कि आप लोगो ने मिलकर हमें अयोध्या का राज सौंपा है क्या अपने राजा का आदेश का पालन आप लोग कर सकते है? सभी ने एक स्वर में कहा कि हम प्रजाजन व मंत्रीगण राजा के आदेष का पालन अवश्‍य करेगें इतना सुनते ही अयोध्या का राज संभालने से पहले भरत ने कहा आप सब हमारे साथ मिलकर अपने प्रिय राजा भैया राम, लक्ष्मण को मनाने के लिए वनप्रदेष में चलना होगा। इतना सुनते ही सारे अयोध्यावासी एकट्ठा हो गये और कौशल्या, कैकैयी, सुमित्रा डोली में बैठ कर अयोध्यावासियों के साथ भरत चला रे अपने राम को मनाने। एक योगी चला रे अपने भैया को मनाने। के गीत की धुन पर थिरकते हुए तथा खुशियों से झुमते हुए चतुरंगिनी सेना के साथ भरत अयोध्या से अपने भैया श्री राम को मनाने के लिए चित्रकुट के लिए प्रस्थान करते है। उधर श्री राम भारद्वाज मुनि के आश्रम से बिदा होकर चित्रकुट में जाते है और वहां पर्णकुटी बनाकर लक्ष्मण व सीता के साथ निवास करने लगे। जब लक्ष्मण ने भरत के आने का समाचार सुना तो क्रोध में आकर भरत से युद्ध करने के लिए आदेश मांगते है इतने में आकाशवाणी हुयी कि हे लक्ष्मण जिससे तु युद्ध करने जा रहा है अगर वो मारा गया तो भाई भरत को तुम जीवित कर सकते हो कोई कार्य करते है तो उस कार्य को भालि भांति समझ लेना चाहिए। थोड़ी देर में लक्ष्मण को क्रोध शांत होता है तो धनुष को नीचे छोड़ देते है। उधर अयोध्या नरेश भरत चतुरंगिणी सेना के साथ गंगा तट पर विश्राम करते है, विश्राम करने के बाद जब उन्हे निषाद से पता चला तो वहां से रथ को छोड़कर नंगे पांव अपने प्रिय भाई राम के लिए दौड़े हुए जाते है उधर राम भी भरत को देखकर नंगे पांव दौड़े-दौड़े दोनो एक दुसरे के गले लगते है। इसके पूर्व श्री राम के सेवा में कोलभिल जी-जान से लगकर उनका सत्कार करते है और महर्शि बालमिकी राम संवाद चल ही रहा था कि भरत की आने की सूचना पाकर श्री राम दौड़े हुए भरत से गले मिलते है। थोड़ी दिन भरत अपने भाई श्री राम के साथ बिताने के बाद श्री राम भरत को बहुत प्रकार से समझाते हुए अपना चरण पादुका (खड़ाऊ) देकर चित्रकुट से बिदा करते है। इस लीला के माध्यम से भाई-भाई का प्रेम देखकर दर्शको के आंख में आंसू छलक आये इस मौके पर-अध्यक्ष दीनानाथ, उपाध्यक्ष प्रकाशचन्द्र श्रीवास्तव, विनय कुमार सिंह, मंत्री श्री ओम प्रकाष तिवारी (बच्चा), सयुक्त मंत्री लक्ष्मी नारायण, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, मेला व्यवस्थापक (कार्यकारी) बीरेश राम वर्मा, उपमेला व्यवस्थापक शिवपूजन तिवारी, कोशाध्यक्ष अभय कुमार अग्रवाल, आय-व्यय निरीक्षक अनुज अग्रवाल , कार्यकारिणी सदस्यगण- राम नारायण पाण्डेय  राजेश प्रसाद  प्रदीप कुमार  ओम नाराणय सैनी अषोक कुमार अग्रवाल  योगेष कुमार वर्मा ऋषि चतुर्वेदी राजेन्द्र विक्रम सिंह अजय पाठक सुधीर कुमार अग्रवाल, अजय कुमार अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।

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