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आगरा अधिवेशन शिवपाल यादव: चल उड़ जा रें पक्षी अब सपा हुआ बेगाना !

लखनऊ। 5 अक्टूबर को आगरा में होने वाली समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर सभी की निगाहें टिकीं हैं। कहा जा रहा है कि पिछले एक साल से पार्टी और मुलायम कुनबे में चली आ रही घमासान का पटाक्षेप इस अधिवेशन के साथ हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि मुलायम के प्रति वफादारी दिखाने वाले छोटे भाई शिवपाल के पल्ले आया क्या?
दरअसल आगरा अधिवेशन में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पांच साल के लिए चुना जाना है, जिसके लिए संविधान में संशोधन की भी बात कही जा रही है। समाजवादी पार्टी एमएलसी सुनील सिंह साजन के मुताबिक अखिलेश यादव का दुबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जाना तय है। ऐसे में एक बात तो साफ है कि समाजवादी पार्टी और यादव परिवार में हाशिए पर धकेले गए शिवपाल के लिए आने वाले दिनों में सियासी भविष्य को लेकर चुनौतियां कम नहीं होंगी। पिछले दिनों लोहिया ट्रस्ट में नई पार्टी न बनाने का ऐलान कर मुलायम ने जहां शिवपाल को झटका दिया वहीं, अखिलेश को अपने चाचा पर मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है। पिछले गुरुवार को अखिलेश ने पिता मुलायम से मुलाक़ात कर उन्हें पार्टी अधिवेशन में शामिल होने का न्योता दिया। हालांकि शिवपाल को इस अधिवेशन के लिए कोई निमंत्रण नहीं दिया गया है। इस बीच बुधवार को खबर आई की अखिलेश और शिवपाल की फोन पर बात हुई और अधिवेशन का निमंत्रण दिया गया। हालांकि शिवपाल ने इस बात को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वे अधिवेशन में नहीं जा रहे हैं। इसके बाद शिवपाल नेताजी से मिलने उनके सरकारी आवास भी पहुंचे। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस बैठक में शिवपाल ने मुलायम से अवश्य ही अपने सियासी भविष्य को लेकर चर्चा की होगी। हालांकि बैठक में क्या बात हुई इसका खुलासा नहीं हो सका है। यूपी की राजनितिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि मुलयम जिस बात से अखिलेश से सबसे ज्यादा नाराज हैं वह है राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद. हो सकता है कि अधिवेशन में कुछ ऐसा देखने को मिले जो समाजवादी पार्टी में पहले कभी नहीं हुआ। मसलन मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर अखिलेश खुद कार्यकारी अध्यक्ष बन जाएं। ऐसी सूरत में शिवपाल का विरोध भी खत्म हो जाएगा। क्योंकि शिवपाल कहते रहे हैं कि वे नेताजी के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी के अन्दर के सूत्र बताते हैं कि ऐसा होने वाला नहीं है और अखिलेश पांच साल के लिए अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ मुलायम ने भी स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वे भले ही अखिलेश से नाराज हों, लेकिन अब पार्टी की कमान उन्हीं के पास होगी। लिहाजा शिवपाल द्वारा मुलायम को लेकर अलग पार्टी बनाने की कवायद अब खत्म हो चुकी है। एक बात यह भी है कि शिवपाल की पूरी राजनीति भाई भक्ति के इर्द-गिर्द रही है। अगर वे अकेले पार्टी बनाते हैं तो उसका प्रभाव भी नहीं होगा. ऐसे में यह एक यक्ष प्रश्न है कि शिवपाल आगे क्या करेंगे? क्योंकि शिवपाल को जहां खुद के लिए एक नया सियासी विकल्प तलाशने की जरुरत होगी वहीं, अपने बेटे को भी राजनीति में स्थापित करना एक बड़ी चुनौती होगी।  दूसरी तरफ एक बात और है कि अब समाजवादी पार्टी में अखिलेश का कद बढ़ रहा है। वे भले ही चुनाव न जीत सकें हों लेकिन सभी सीनियर नेता उनके साथ हैं और शिवपाल अलग-थलग पड़ चुके हैं। दरअसल शिवपाल की राजनीति मुलायम सिंह के इर्द-गिर्द रही, यही वजह है कि उनका कोई बड़ा जनाधार नहीं है।

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