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अफजाल, ओमप्रकाश व राधेमोहन को नया साल 2018 देगा राजनैतिक अस्तित्व की चुनौती

शिवकुमार

गाजीपुर। राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी अफजाल अंसारी, ओमप्रकाश सिंह व राधेमोहन सिंह को नया साल 2018 चुनौतियों का वर्ष होगा। लोकसभा चुनाव से पहले का वर्ष उनके लिए एक बार फिर जनमानस के दिल को जीतने का चैलेंज होगा। इन धुरंधरों को पार्टी के अंदर और बाहर दोनो चुनौतियों का भी सामना करने का कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। पूर्व सांसद अफजाल अंसारी का 2017 मिला-जुला रहा। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद निकाय चुनाव ने उनको एक बार फिर से संजीवनी दे दी। पार्टी के अंदर और बाहर के विरोधियों को उन्होने निकाय चुनाव से ललकारा, अंसारी बंधुओं की अभी राजनैतिक कश्ती डूबी नही है। बसपा के हाईकमान भी वर्तमान समय में अंसारी बंधुओं पर मेहरबान है क्यों कि लोकसभा 2019 में हाथी को मुस्लिमों के नाव पर ही बैठकर पार होना है। पूर्व पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह विधानसभा में मिली करारी हार से राजनैतिक हासिये पर आ गये है। वह अपनी राजनैतिक विरासत को हासिल करने के लिए ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे है। ओपी सिंह को पार्टी के अंदर और बाहर दोनो प्लेेटफार्म पर कड़ी चुनौ‍ती मिल रही है। एक तरफ पार्टी के हाईकमान अखिलेश यादव को खुश करके उन्हें विश्वांस दिलाना की वही लोकसभा चुनाव में रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्‍हा और हाथी को टक्कार दें सकते है। दूसरे तरफ पार्टी के अंदर जिले में गुटबाजी पर भी उन्हे काबू पाना होगा। पार्टी का एक गुट उन्हेर बैकवर्ड विरोधी होने का प्रचार करता रहता है। पूर्व सांसद राधेमोहन सिंह को अपनी विरासत पाने के लिए 2018 में कड़ा इम्तेहां देना पड़ेगा। क्योंउकि टिकट के दौड़ में एक तरफ उनके कट्टर प्रतिद्वंदी पूर्व पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह है और उनके राजनैतिक गुरू रामकरन दादा के पुत्र एमएलसी विजय यादव, भोजपूरिया स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ, राजेश कुशवाहा शामिल है। राधेमोहन सिंह को समाजवादी टिकट से लेकर चुनाव जीतने तक का होमवर्क इसी वर्ष 2018 में पूरा करना है। अब देखना है कि पूर्व सांसद राधेमोहन सिंह इस पर कैसे विजय प्राप्तर करते है। तीनो राजनैतिक धुरंधरो के लिए 2018 चुनौतियों से भरा वर्ष है क्यों कि इसी वर्ष में इनकी राजनीतिक हैसियत का परीक्षा होनी है।

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