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लखनऊ: अखिलेश यादव और राहुल गांधी की टूट सकती है दोस्ती !

लखनऊ। 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में शुरू हुई समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की दोस्ती टूट सकती है। दरअसल सपा में एक बड़ा तबका संरक्षक मुलायम सिंह यादव की इस बात से सहमत है कि कांग्रेस से दोस्ती का कुछ भी फायदा पार्टी को नहीं मिला है। लिहाजा सपा-कांग्रेस गठबंधन 2019 तक जारी रखना फायदेमंद नहीं है। इसी क्रम में सोमवार को अखिलेश यादव ने विधायकों, हारे हुए प्रत्याशियों और जिन सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था वहां के जिला पदाधिकारी और जिलाध्यक्षों के साथ अहम बैठक की। इस बैठक में 2019 लोकसभा चुनाव  और गठबंधन पर चर्चा हुई। इस बैठक में उन सीटों के जिला अध्यक्षों और पदाधिकारियों से फीडबैक लिया गया, जहां पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा और जिन सीटों पर गठबंधन की वजह से प्रत्याशी नहीं खड़े हुए थे। अंदरखाने से खबर आ रही है कि इन लोगों पार्टी आलाकमान को बताया है कि गठबंधन से सपा को कोई फायदा नहीं हुआ है। हालांकि अभी इस बात पर निर्णय नहीं हुआ है कि गठबंधन जारी रहेगा या नहीं। आज की बैठक में रामगोपाल यादव, अहमद हसन, बसपा छोड़कर सपा में आए आरके चौधरी, बलराम यादव, किरणमय नंदा ,राजेन्द्र चौधरी और राम गोविंद चौधरी मौजूद रहे। बता दें सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव शुरुआत से ही कांग्रेस के साथ गठबंधन के खिलाफ थे। वे इस बात को कई बार सार्वजानिक मंच से बोल भी चुके हैं। गठबंधन के बावजूद विधानसभा चुनावों में पार्टी को मिली करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ने पार्टी की हार के लिए कांग्रेस से दोस्ती को जिम्मेदार ठहराया था। अब मुलायम की इस बात का समर्थन पार्टी कार्यकर्ता भी करते दिख रहे हैं। हालांकि इससे पहले अखिलेश यादव ने शनिवार को गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा उपचुनाव में गठबंधन और ईवीएम की जगह बैलट पेपर से चुनाव कराए जाने की मांग को लेकर सभी विपक्षी दलों को बैठक के लिए बुलाया था. हालांकि बैठक में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और बसपा का कोई भी नेता नहीं पहुंचा था। दोनों ही दलों ने सपा की मांग में अपना समर्थन पत्र जरुर भेजा था। कहा जा रहा है कि गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के लिए साझा उम्मीदवार उतारने की अखिलेश यादव की कोशिश को बसपा और कांग्रेस ने झटका दिया है. ईवीएम के बहाने विपक्ष को एकजुट करने के लिए अखिलेश द्वारा भेजे गए निमंत्रण के बावजूद दोनों ही दलों के नेताओं का इससे दूर रहना यह दिखाता है कि गठबंधन अधर में है। हालांकि बैठक के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि सभी दलों में सहमती बनी है कि आगे भी इस तरह की बैठक जारी रहेगी. उन्होंने कहा कि सभी दल बैठेंगे तो गठबंधन को लेकर रास्ता भी निकलेगा. अखिलेश ने कहा हमने सभी दलों को इसलिए बुलाया गया था कि गोरखपुर और फूलपुर चुनाव एक साथ मिलकर लड़ें और ईवीएम की जगह बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए। कांग्रेस और सपा विधानसभा चुनाव में गठबंधन से हुए नुकसान से सबक लेकर अपने रास्ते अलग कर सकती है। सपा की कांग्रेस को दी गई सीटों पर समीक्षा के साथ ही कांग्रेस ने भी संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया है। कांग्रेस आने वाले उपचुनाव को लेकर तो अकेले मैदान में उतरने की बात कर रही है, लेकिन 2019 की लड़ाई के लिए भी पार्टी अपने दम पर लड़ने का फैसला कर सकती है। कांग्रेस प्रवक्ता द्विजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा ये सोच कहीं न कहीं दोनों पार्टियों में है। 2017 में दोनों ही पार्टियों का अचानक गठबंधन हुआ और इसमें दोनों ही पार्टियों का नुकसान हुआ। एक विचार ये आया कि देखा जाए कि इसके पीछे का कारण क्या था। कहीं गठबंधन तो इसकी वजह नहीं थी। इसी वजह से दोनों ही दल समीक्षा कर रहे हैं, कांग्रेस पार्टी में भी नेताओं की अलग-अलग राय है। गौरतलब है कि सपा से गठबंधन के बाद कांग्रेस को तगड़ा नुकसान हुआ. पार्टी के बड़े नेता अब कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अपनी ताकत तलाशने के लिए समीक्षा में जुटे हैं। अखिलेश यादव की ईवीएम को लेकर हुई सर्वदलीय बैठक से भी कांग्रेस नदारद दिखी थी। जिसके ठीक बाद सपा ने कांग्रेस से मिलकर लड़ने से हुए नुकसान का सर्वे शुरू किया है। लिहाज़ा अब दोनों दलों में फासला बढ़ता दिख रहा है।

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