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बलिया: 1998 में आखिरी बार गांव आये थे कथाकार दूधनाथ

बलिया। जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी दूर स्थित सोबंथा गांव में 17 अक्टूबर 1936 जन्मे कथाकार दूधनाथ सिंह आखिरी बार 1998 में अपने गांव आये थे। अवसर यह था कि पूर्व पीएम चन्द्रशेखर के ऊपर उनके द्वारा लिखा हुआ भारतीय राजनीतिक के फक्कड़ कबीर चन्द्रशेखर पुस्तक का विमोचन टाउन हाल में आयोजित था। उस समय भारत के पत्रकार के भी शामिल थे। प्रभात जोशी, रामबहादुर राय, कृपाशंकर चौबे, विनय बिहारी सिंह, अरविन्द चतुर्वेश के अलावा साहित्यकार डॉ. केदार नाथ मौजूद थे। पूर्व पीएम चन्द्रशेखर के हाथों जैसे ही पुस्तक का विमोचन हुआ, दूधनाथ सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक को देखकर चन्द्रशेखर भावुक हो गये। श्री सिंह शांत स्वभाव के थे और उनके विचार उच्च थे। पुस्तक के विमोचन समारोह में जब उन्हें इलाहाबाद से वाराणसी लाने की बात कही गई तो उन्होंने कहा कि मै एक शर्त पर ही जाऊंगा कि पहले मै अपने गांव पहुंचूंगा और यहां से आयोजन स्थल पर जाऊंगा। बलिया के शिक्षक नेता तारकेश्वर सिंह को दूधनाथ सिंह को लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। तारकेश्वर सिंह उनको लेकर शोभनथा गांव पहुंचे, जहां काफी देर तक अपने भाईयों से मिलने के बाद वे टाउन हाल पहुंचे। टाउन हाल में दूधनाथ सिंह के पहुंचने पर कार्यक्रम में चारचांद लग गया और सभी ने पुस्तक की सराहना की। पूर्व पीएम चन्द्रशेखर ने भी दूधनाथ सिंह की लिखी पुस्तक पर कहा था कि भारत में ऐसे कथाकार कम मिलते है। उन्होंने उनको बधाई भी दी थी। जब भारतीय राजनीति में फक्कड़ कबीर चन्द्रशेखर की किताब का संबोधन संचालक ने किया तो लोग मुस्कुरा उठे। इस मुस्कुराहट पर दूधनाथ सिंह के चेहरे पर भी हंसी दिखी। कथाकार दूधनाथ सिंह के छोटे भाई रामाधार सिंह को जैसे ही जानकारी मिली कि बड़े भाई दूधनाथ सिंह का निधन हो गया है, उनके आंखों से आंसू निकलने लगा। रोते हुए कहा कि भैया 1998 में आये थे और दो दिनों तक साथ रहे। वह हमेशा साहित्य के बारे में ही बात करते थे। बचपन की कहानी को दोहराते हुए रामाधार सिंह ने कहा कि बचपन में हम लोग एक साथ निकलते थे और एक साथ खाना व सोना होता था। आज भैया इस दुनिया से विदा हो गये। वे पेड़ पर चढ़ते समय भी किताब पढ़ते थे। वे जहां भी शांत स्थान देखते थे वहां बैठकर किताब पढ़ने लगते थे। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उनको दातुन करना था और घर में दातुन नहीं था। वे पेड़ पर चढ़ गये और किताब पढ़ने लगे। वहीं, गांव के मंगला सिंह, बब्बन सिंह, नंदकिशोर वर्मा, हरिपूजन वर्मा ने कहा कि वह गांव आते थे, लेकिन उनमें एक खासियत थी कि वे सबसे मिल जुलकर ही रहते थे। वे लोगों से बिना मिले कहीं नहीं जाते थे। सबसे हंस कर बात करते थे। कथाकार दूधनाथ सिंह के निधन की जानकारी जैसे ही ग्राम प्रधान ईश्वर दयाल को हुई वे गांव पहुंचे और परिजनों से मिलने के बाद उन्होंने निधन पर गहरा शोक प्रकट किया। कहा कि भले ही दूधनाथ सिंह दुनिया से विदा हो गये, लेकिन गांव में वे हमेशा जिंदा रहेंगे। उनके नाम पर शोभनथा गांव मार्ग पर द्वार बनाया जायेगा। यदि घर के लोगों ने जमीन उपलब्ध कराया तो उनकी आदमकद प्रतिमा भी लगायी जायेगी, ताकि देशभर के लोग यहां आये और उनकी जयंती व पुण्यतिथि पर श्रद्धा के दो फूल चढ़ा सके। जहां ग्राम प्रधान पत्रकारों से बात कर रहे थे, वहीं भाई रामाधार सिंह एवं भतीजा योगेन्द्र सिंह की आंखों से आंसू टपक रहे थे। कथाकार दूधनाथ सिंह गांव से सटे नरही में कक्षा एक से आठ तक की शिक्षा ली थी। कक्षा नौ से 12 तक की शिक्षा मर्चेण्ट इंका चितबड़ागांव एवं बीए की शिक्षा सतीश चन्द्र कालेज से ग्रहण की थी। इसके बाद श्री सिंह ने इलाहाबाद विवि से हिंदी विषय से एमए किया था।

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