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बाहुबलियों के गुरू हरिशंकर तिवारी को हो रहा है कमल के फूल से प्रेम

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सियासी भूचाल की आहट सुनाई दे रही है। लखनऊ के सत्ता के गलियारे में बाहुबली नेता और पूर्वांचल में बड़ा ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले हरिशंकर तिवारी की भारतीय जनता पार्टी से नजदीकी पर चर्चाएं तेज हैं. कहा जा रहा है कि हरिशंकर तिवारी अपने भांजे गणेश शंकर पांडेय के सहारे ये नई सियासी पारी खेलने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल पूर्वांचल की राजनीति में गणेश शंकर पांडेय को साफ-सुथरी छवि की वजह से गोरखपुर और महाराजगंज जिले के प्रभावशाली नेताओं में माना जाता रहा है. गणेश शंकर ​पांडेय चार बार एमएएलसी और विधानपरिषद में उपसभापति रह चुके हैं। गणेश शंकर पांडेय हरिशंकर तिवारी को अपना राजनीतिक गुरू मानते रहे हैं। अब गणेश शंकर पांडेय के बीजेपी में शामिल होने की अटकलें चल रही हैं. हालांकि बीजेपी की तरफ से अभी तक इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. लेकिन कयासों के दौर चरम पर हैं। राजनीति के विश्लेषक मानते हैं अगर गणेश शंकर पांडेय बीजेपी में शामिल होते हैं, तो पूर्वांचल में ब्राह्मण वोट बैंक को लुभाने में उसे सहायता मिलेगी. गोरखपुर में जल्द ही लोकसभा उपचुनाव होना है. ये सीट सीएम योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से खाली हुई है। इस सीट पर गोरक्षपीठ का वर्चस्व रहा है. गोरखपुर सीट पर क्षत्रियों के साथ ही ब्राह्मणों का भी खासा प्रभाव रहा है। अगर गणेश शंकर गोरखपुर उपचुनाव में प्रत्याशी के रूप में आते हैं तो बीजेपी एक साथ कई सन्देश देने में कामयाब हो जायेगी। इसमें योगी आदित्यनाथ पर जाति विशेष को तरजीह दिए जाने के जो आरोप लगते रहे हैं, वह धुल जायेगा। कारण यह कि हरिशंकर तिवारी का गोरखपुर में चर्चित ‘हाता’ की पहचान ब्राह्मण वर्ग के प्रबल पक्षधर के रूप में है। योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद एक अपराधी को पकड़ने के चक्कर में इसी ‘हाता’ में पुलिस रेड ने पूर्वांचल की राजनीति में खासा असर डाला था. ब्राह्मण वोट बैंक में इसका नकारात्मक प्रभाव देखने को मिला था। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कोशिश में है. वर्तमान में बीजेपी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय बनारस से और केंद्र में वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला गोरखपुर से पार्टी का बड़ा ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं. हरिशंकर तिवारी की बीजेपी से नजदीकी पार्टी को नाराज ब्राह्मण वोटरों को साधने में आसानी होगी। बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि पार्टी के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया है। हालांकि राकेश त्रिपाठी साथ ही ये भी कहते हैं कि बीजेपी बड़ी पार्टी है, उसकी 19 राज्यों मे सरकार है, ​जाहिर सी बात है कि हर कोई उससे जुड़ना चाहता है। हम हर उस शख्स का स्वागत करते हैं, जो राष्ट्रवादी विचारों को आगे बढ़ाए और दाग रहित हो। लेकिन अगर बीजेपी ये कदम उठाती है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल आना तय माना जा रहा है. कारण गोरखपुर की राजनीति का इतिहास है।  जो हरिशंकर तिवारी और गोरक्षपीठ के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। दरअसल उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की एक विधानसभा सीट है चिल्लूपार 1985 में ये सीट एकाएक उस वक़्त चर्चा में आ गई, जब हरिशंकर तिवारी नाम के निर्दलीय उम्मीदवार ने जेल के अंदर से यहां चुनाव जीता. इसी के साथ भारतीय राजनीति में अपराध के सीधे प्रवेश का दरवाजा भी खुल गया।  हरिशंकर तिवारी के राजनीति में प्रवेश से न सिर्फ उनके चिरविरोधी कहे जाने वाले वीरेंद्र प्रताप शाही ने भी लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से जीत हासिल की बल्कि ख़ुद तिवारी भी राजनीति की बुलंदियां छूते चले गए। अभी तक गोरखपुर में इन दो गुटों में वर्चस्व की लड़ाई होती थी. लेकिन दोनों गुटों के प्रमुखों के राजनीति में आने के बाद ये लड़ाई राजनीति के कैनवास पर भी लड़ी जाने लगी. साल 1997 में वीरेंद्र शाही की लखनऊ में हुई दिनदहाड़े हत्या ने इस वर्चस्व की लड़ाई पर विराम लगा दिया। हरिशंकर तिवारी न सिर्फ लगातार 22 वर्षों तक विधायक रहे, बल्कि साल 1997 से लेकर 2007 तक कई बार मंत्री भी रहे। इस दौरान प्रदेश में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हर पार्टी की सरकार में हरिशंकर तिवारी मंत्री बने रहे। हालांकि राजनीति की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस पार्टी से की लेकिन कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल से होते हुए वह राजनाथ सिंह, मायावती से लेकर मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में अपना नाम पक्का करवाते रहे। हरिशंकर तिवारी के बाद पूर्वांचल में माफ़िया और राजनीति का कथित गठजोड़ मुख़्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, रमाकांत यादव, उमाकांत यादव, धनंजय सिंह के साथ-साथ अतीक अहमद, अभय सिंह, विजय मिश्र और राजा भैया तक पहुंच गया।

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