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मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर को उन्नत नैनो-गैस सेंसर तकनीक पर मिला भारतीय पेटेंट

लखनऊ। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर ने अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के दो वैज्ञानिकों को हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों की अत्यधिक सटीक पहचान करने वाली उन्नत नैनो-गैस सेंसर तकनीक के लिए भारतीय यूटिलिटी पेटेंट प्राप्त हुआ है। “डिजाइनिंग ऑफ एन₂ओ नैनो-गैस सेंसर यूजिंग 2डी एमओएसई₂ मोनोलेयर” शीर्षक से विकसित इस तकनीक का आविष्कार एमएमएमयूटी के डॉ. ब्रम्हा प्रकाश पांडेय एवं डॉ. नेहा मिश्रा ने किया है। दोनों शोधकर्ता पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए नई पीढ़ी के नैनोमैटेरियल्स विकसित करने पर कार्य कर रहे हैं। यह तकनीक वातावरण में मौजूद उन हानिकारक गैसों की सटीक पहचान करने में सक्षम है, जो प्रदूषण बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं के प्रमुख कारण हैं। वर्तमान समय में तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन तथा कृषि गतिविधियों के कारण वातावरण में हानिकारक गैसों की मात्रा लगातार बढ़ रही है। नाइट्रोजन ऑक्साइड्स और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वायु प्रदूषण, पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान तथा वैश्विक तापमान वृद्धि का कारण बनती हैं। ऐसे में इन गैसों की निरंतर और सटीक निगरानी पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। मौजूदा गैस सेंसिंग तकनीकों में कम संवेदनशीलता, सीमित चयन क्षमता तथा धीमी प्रतिक्रिया जैसी समस्याएं रहती हैं, जिससे उनका व्यापक उपयोग प्रभावित होता है। एमएमएमयूटी के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इस नई तकनीक में मैंगनीज (एमएन) डोप्ड टू-डायमेंशनल (2डी) मोलिब्डेनम डाइसेलेनाइड (एमओएसई₂) मोनोलेयर का उपयोग केमिकल-रेजिस्टिव गैस सेंसिंग सिस्टम के रूप में किया गया है। इसमें मैंगनीज परमाणुओं के समावेश से गैस अणुओं का अवशोषण काफी बेहतर हो जाता है, जिससे हानिकारक गैसों की अत्यधिक संवेदनशीलता और सटीकता के साथ पहचान संभव होती है। साथ ही सेंसर बहुत कम समय में प्रतिक्रिया देने और पुनः सामान्य स्थिति में लौटने में सक्षम है। इस पेटेंट की सबसे बड़ी विशेषता इसका नये ढंग का सेंसर आर्किटेक्चर है, जो 2डी एमओएसई₂ मोनोलेयर पर आधारित है। इसमें अत्यधिक सरफेस-टू-वॉल्यूम रेशियो, बेहतर चार्ज ट्रांसफर क्षमता तथा मात्र 10 से 14 सेकंड का रिकवरी टाइम प्राप्त होता है। इस नैनोस्ट्रक्चर्ड सतह को विशेष रूप से नाइट्रस ऑक्साइड (एन₂ओ) गैस के अणुओं के साथ अधिक प्रभावी संपर्क स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है। इसी कारण यह सेंसर पारंपरिक गैस सेंसरों की तुलना में अधिक संवेदनशील और अधिक सटीक परिणाम देता है। मैटेरियल इंजीनियरिंग और नैनोस्केल फंक्शनलाइजेशन का यह अनूठा संयोजन इसे पर्यावरण निगरानी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि बनाता है। यह तकनीक केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक उपयोग की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसका उपयोग औद्योगिक इकाइयों में उत्सर्जन की निगरानी, पर्यावरण मॉनिटरिंग नेटवर्क, स्मार्ट सिटी, कृषि क्षेत्रों तथा कार्यस्थलों की सुरक्षा व्यवस्था में किया जा सकता है, जहां हानिकारक गैसों की लगातार निगरानी आवश्यक होती है। इसकी अधिक संवेदनशीलता, तेज प्रतिक्रिया और बेहतर चयन क्षमता के कारण वास्तविक समय में गैसों की पहचान संभव होगी, जिससे समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे तथा पर्यावरणीय मानकों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सकेगा। यह तकनीक भविष्य में छोटे आकार, ऊर्जा दक्ष और कम लागत वाले गैस सेंसिंग डिवाइस विकसित करने का भी मार्ग प्रशस्त करेगी। इस उपलब्धि पर शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए माननीय कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने कहा कि यह पेटेंट विश्वविद्यालय की उस शोध संस्कृति का प्रमाण है, जो समाज और पर्यावरण से जुड़ी समकालीन चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि नैनोटेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सस्टेनेबल इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में हो रहे नवाचार भविष्य की दिशा तय कर रहे हैं। विश्वविद्यालय ऐसे अंतर्विषयक अनुसंधान को लगातार प्रोत्साहित कर रहा है, जो प्रभावी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और देशहित में उपयोगी तकनीकों के विकास का आधार बने। यह उपलब्धि एक बार फिर सिद्ध करती है कि एमएमएमयूटी नवाचार और अनुप्रयुक्त अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी संस्थानों में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। विश्वविद्यालय के शिक्षक लगातार अत्याधुनिक तकनीकों पर शोध करते हुए वैज्ञानिक ज्ञान को नई दिशा देने के साथ-साथ वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान भी विकसित कर रहे हैं।

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