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गांव की पाठशाला से रसायन विज्ञान की ऊंचाइयों तक: बीएचयू में प्रो. दया शंकर पांडेय के 65वें जन्मदिवस पर व्याख्यान श्रृंखला आयोजित

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रो. दया शंकर पांडेय की शैक्षणिक यात्रा इस बात का प्रेरणादायी उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प, शिक्षा और वैज्ञानिक जिज्ञासा किस प्रकार ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले एक विद्यार्थी के जीवन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। गांव के एक विद्यालय से शिक्षा की शुरुआत कर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक आईआईटी कानपुर तक पहुंचना और फिर बीएचयू में प्रोफेसर के रूप में प्रतिष्ठित होना इस बात का संदेश देता है कि किसी भी गांव का बच्चा उच्च शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च स्तर तक पहुंचने का सपना देख सकता है। प्रो. पांडेय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश के एक प्राथमिक विद्यालय से शुरू की। सीमित संसाधनों के बावजूद सीखने की प्रबल इच्छा और आगे बढ़ने के दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। उन्होंने के.एस. साकेत पी.जी. कॉलेज, अयोध्या से बी.एससी. और एम.एससी. की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने यूजीसी-नेट एवं जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसने उनके लिए उच्चस्तरीय शोध के द्वार खोले। वर्ष 1983 में उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर में पीएच.डी. के लिए प्रवेश लिया, जो उनके अकादमिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। आईआईटी कानपुर में उनका शोध एरीन-रूथेनियम कॉम्प्लेक्स पर केंद्रित था, जिसमें इनके संभावित कैंसररोधी अनुप्रयोगों का अध्ययन किया गया। यह प्रारंभिक शोध उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा और बहुआयामी शोध दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो आगे चलकर उनके वैज्ञानिक जीवन की प्रमुख विशेषता बना। पीएच.डी. के बाद प्रो. पांडेय ने अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश में लेक्चरर के रूप में कार्य किया। इसके बाद उनका अकादमिक और शोध करियर निरंतर आगे बढ़ता गया और अंततः वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े, जहां उन्होंने रसायन विज्ञान के क्षेत्र में एक शिक्षक, शोधकर्ता और अकादमिक नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इनऑर्गेनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान के क्षेत्र में उनके शोध का दायरा व्यापक रहा है। उनके प्रमुख शोध कार्यों में कैटेलिटिक कन्वर्जन, मेटल कॉम्प्लेक्स, मेटल-नाइट्रोसिल कॉम्प्लेक्स के संश्लेषण की विधियों का विकास, डाय-पाइरिन कॉम्प्लेक्स का अभिलक्षण तथा उनके उत्प्रेरक और जैव-उत्प्रेरक के रूप में उपयोग शामिल हैं। उन्होंने BODIPY कॉम्प्लेक्स के विकास तथा उनके ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों के क्षेत्र में भी योगदान दिया है। उनका शोध मौलिक रसायन विज्ञान को उत्प्रेरण, जैविक प्रणालियों और उन्नत पदार्थ विज्ञान जैसे अनुप्रयोगों से जोड़ता है। उनके वैज्ञानिक योगदान को कई प्रतिष्ठित फेलोशिप और अंतरराष्ट्रीय अवसरों के माध्यम से मान्यता मिली है। उनकी प्रमुख उपलब्धियों में फेलो ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (FNASc), फेलो ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया (FNA), जे. सी. बोस फेलोशिप तथा JSPS फेलोशिप, ओसाका, जापान शामिल हैं। उनके शोध समूह को हम्बोल्ट फेलोशिप और मैरी क्यूरी फेलोशिप सहित 13 प्रतिष्ठित फेलोशिप भी प्राप्त हुई हैं। शोध के अलावा प्रो. पांडेय ने अकादमिक प्रशासन और वैज्ञानिक नीति के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने 2018 से 2021 तक बीएचयू के रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे लगभग 30 महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तर की अकादमिक एवं शोध समितियों से जुड़े रहे हैं, जिनमें DST-FIST Committee in Chemical Sciences, SERB Fast Track Young Scientist Committee, SAP Interface, DST-PURSE तथा UGC-UPE Implementation Committee प्रमुख हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने कई महत्वपूर्ण संस्थागत पहलों और वैज्ञानिक सुविधाओं से जुड़ी जिम्मेदारियां भी निभाई हैं। उन्होंने Institution of Eminence (IoE), Central Discovery Centre (CDC), SATHI, 600 MHz NMR Facility तथा उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों की खरीद से संबंधित विभिन्न समितियों में नेतृत्वकारी एवं सलाहकार भूमिकाएं निभाई हैं। ये जिम्मेदारियां उनके वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक अनुभव में विश्वविद्यालय के विश्वास को दर्शाती हैं। हालांकि, डिग्रियों, पदों, फेलोशिप और वैज्ञानिक उपलब्धियों से परे उनकी कहानी शैक्षणिक उन्नति, संघर्ष और दृढ़ता की एक बड़ी कहानी है। प्रो. पांडेय की यात्रा विशेष रूप से गांवों और छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है। गांव की एक कक्षा और देश के प्रतिष्ठित शोध संस्थान के बीच की दूरी भले ही बहुत बड़ी दिखाई दे, लेकिन उनका जीवन यह साबित करता है कि शिक्षा की शुरुआत यह निर्धारित नहीं करती कि जीवन की मंजिल क्या होगी। सीमित अवसरों से शुरुआत करने वाला विद्यार्थी भी शिक्षा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर आईआईटी कानपुर जैसे संस्थान तक पहुंच सकता है और आगे चलकर देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों में विज्ञान के क्षेत्र में योगदान दे सकता है। उनकी कहानी केवल एक वैज्ञानिक की व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति की कहानी भी है। यह उन अनगिनत युवाओं के लिए प्रेरणा है जो उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थितियों के कारण अपने सपनों पर विश्वास नहीं कर पाते। गांव के विद्यालय की कक्षाओं से लेकर आईआईटी कानपुर की प्रयोगशालाओं तक, रूथेनियम कॉम्प्लेक्स पर प्रारंभिक शोध से लेकर कैटेलिसिस और कार्यात्मक मेटल कॉम्प्लेक्स के उन्नत शोध तक, तथा अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में एक युवा लेक्चरर से लेकर बीएचयू के प्रतिष्ठित प्रोफेसर एवं अकादमिक नेतृत्वकर्ता बनने तक—प्रो. दया शंकर पांडेय की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि महत्वाकांक्षा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। गांव का वह बच्चा जो रात के आकाश को देखकर वैज्ञानिक बनने का सपना देखता है, उसके लिए प्रो. पांडेय का जीवन एक सरल लेकिन शक्तिशाली संदेश देता है—”आपकी शुरुआत परिस्थितियां तय कर सकती हैं, लेकिन आप कितनी दूर तक जाएंगे, यह आपकी शिक्षा, मेहनत, दृढ़ संकल्प और सपने देखने का साहस तय कर सकता है।” प्रख्यात वैज्ञानिकों ने अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान के उभरते आयामों पर विचार साझा किए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में विज्ञान संस्थान के रसायन विज्ञान विभाग के संकाय सदस्यों द्वारा वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. दया शंकर पांडेय के 65वें जन्मदिवस तथा उनके वैज्ञानिक योगदान के सम्मान में ‘अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान के उभरते आयाम’ विषय पर एक दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विज्ञान संस्थान के महामना हॉल, संगोष्ठी संकुल में किया गया। इसका आयोजन डॉ. आशीष कुमार, डॉ. रूप शिखा सिंह तथा प्रो. डी. एस. पांडेय के शोध समूह के अन्य पूर्व शोधार्थियों द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक एवं राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान बोर्ड के संस्थापक सचिव प्रो. टी. के. चंद्रशेखर ने उद्घाटन व्याख्यान दिया। उद्घाटन सत्र में प्रो. टी. के. चंद्रशेखर, विजिटिंग प्रोफेसर, संस्थापक निदेशक, राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, भुवनेश्वर ने उद्घाटन व्याख्यान दिया। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. गणेश पांडेय एवं रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. एन. सिंह ने की। वैज्ञानिक सत्र में जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. समरेश भट्टाचार्य, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के प्रो. आर. मुरुगावेल तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव गुप्ता ने अकार्बनिक एवं ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन विज्ञान में समकालीन अनुसंधान तथा उभरते क्षेत्रों पर विशेष व्याख्यान दिए। व्याख्यानों में आधुनिक रसायन विज्ञान के क्षेत्र में हो रही नवीन प्रगति, उन्नत धातु संकुलों तथा उनके संभावित अनुप्रयोगों पर चर्चा की गई। द्वितीय सत्र में शोधार्थियों ने अपने शोध कार्यों पर मौखिक प्रस्तुतियां दीं। इस सत्र ने युवा शोधकर्ताओं को अपने अनुसंधान कार्य प्रस्तुत करने तथा वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ वैज्ञानिक संवाद करने का अवसर प्रदान किया। इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर के प्रो. संजय के. सिंह एवं प्रो. मृगेन्द्र दुबे ने की। कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण प्रो. दया शंकर पांडेय का अभिनंदन समारोह रहा। इस अवसर पर उनके सहयोगियों, शोधार्थियों एवं पूर्व शोधार्थियों ने उनके वैज्ञानिक योगदान तथा मार्गदर्शन के प्रति सम्मान एवं आभार व्यक्त किया। इसके पश्चात उनके सम्मान में अभिनंदन भाषण तथा शिक्षकों एवं उपस्थित प्रतिभागियों के साथ खुला संवाद आयोजित किया गया। देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए प्रख्यात वैज्ञानिकों तथा प्रो. पांडेय के शोध समूह के पूर्व शोधार्थियों की सहभागिता ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की। इस आयोजन ने वैज्ञानिक अनुसंधान के महत्व के साथ-साथ शिक्षक-शोधार्थी संबंधों, अकादमिक सहयोग तथा वैज्ञानिक विरासत के महत्व को रेखांकित किया। प्रो. संजय कुमार, निदेशक, विज्ञान संस्थान की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए प्रख्यात वैज्ञानिकों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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