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श्रीरामलीला कमेटी हरिशंकरी गाजीपुर: भरत आगमन, मनावन एवं विदाई लीला का मंचन देख दर्शक हुए भावविभोर

गाजीपुर। अतिप्राचीन श्रीरामलीला कमेटी हरिशंकरी के तत्वावधान में मंगलवार की शाम लीला के आठवें दिन सकलेनाबाद स्थित भारद्वाज मुनि के आश्रम पर भरत आगमन, मनावन एवं विदाई लीला का भावपूर्ण मंचन किया गया। पं. राजा भैया तिवारी आदर्श श्रीरामलीला मंडल के कलाकारों ने राम-भरत मिलन और भ्रातृप्रेम के प्रसंगों का सजीव चित्रण कर दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इससे पूर्व कमेटी के मंत्री ओमप्रकाश तिवारी सहित अन्य पदाधिकारियों ने सिंहासन पर विराजमान प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के स्वरूपों की आरती की। लीला में दिखाया गया कि निषादराज के साथ गंगा पार करने के बाद प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता महर्षि भारद्वाज तथा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचते हैं। महर्षि वाल्मीकि से निवास के लिए उचित स्थान पूछने पर वे प्रभु श्रीराम को चित्रकूट में निवास करने का सुझाव देते हैं। इसके बाद प्रभु श्रीराम कोल-भील समुदाय से मिलते हुए चित्रकूट पहुंचते हैं और वनवासियों के सहयोग से पर्णकुटी बनाकर रहने लगते हैं। दूसरी ओर, गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय देश से अयोध्या लौटते हैं। वहां सन्नाटा देखकर भरत माता कैकेयी से पिता महाराज दशरथ और बड़े भाई श्रीराम के बारे में पूछते हैं। कैकेयी उन्हें बताती हैं कि अपने दो वरदानों के तहत उन्होंने भरत के लिए राजतिलक और श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा था। यह सुनकर भरत और शत्रुघ्न स्तब्ध रह जाते हैं। पिता की मृत्यु और बड़े भाई के वनवास से व्यथित भरत श्रीराम को वापस लाने का संकल्प लेते हैं। इसके बाद भरत, शत्रुघ्न, गुरु वशिष्ठ और तीनों माताओं सहित चतुरंगिणी सेना के साथ श्रीराम को मनाने चित्रकूट के लिए प्रस्थान करते हैं। महाराज भरत, शत्रुघ्न और गुरु वशिष्ठ की शोभायात्रा बाजे-गाजे के साथ हरिशंकरी स्थित श्रीराम सिंहासन से शुरू हुई। शोभायात्रा मुरली कटरा, पावर हाउस, झुन्नू लाल चौराहा, आमघाट राजकीय महिला महाविद्यालय, चित्रगुप्त चौराहा, ददरीघाट, महुआबाग, चौक और पहाड़ खां के पोखरे होते हुए सकलेनाबाद में राखनलाल के मकान के पास स्थित श्रीराम चबूतरे पर पहुंची। उधर, सेना को आते देख लक्ष्मण क्रोधित हो उठते हैं, लेकिन प्रभु श्रीराम उन्हें समझाते हैं। भरत की नजर जैसे ही बड़े भाई श्रीराम पर पड़ती है, वे दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं। श्रीराम उन्हें उठाकर गले लगा लेते हैं। दोनों भाइयों का मिलन देखकर दर्शक भावुक हो उठते हैं। भरत गुरु वशिष्ठ और माताओं की उपस्थिति में श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजकाज संभालने की विनती करते हैं। हालांकि, पिता के वचन का पालन करने के लिए श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के अपने संकल्प पर अडिग रहते हैं। भरत के बार-बार आग्रह के बावजूद श्रीराम अयोध्या लौटने से इनकार कर देते हैं और उन्हें वापस जाने का आदेश देते हैं। अंततः भरत बड़े भाई की चरण पादुका सिर पर रखकर अयोध्या लौटने का निर्णय लेते हैं। यह प्रसंग भाई के प्रति त्याग, समर्पण और मर्यादा का संदेश देता है। इस दौरान कमेटी के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, उपमंत्री लव कुमार त्रिवेदी, मेला प्रबंधक मनोज कुमार तिवारी, उपमेला प्रबंधक मयंक तिवारी, कोषाध्यक्ष रोहित अग्रवाल, कृष्ण त्रिवेदी, राम सिंह यादव सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक मौजूद रहे।

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