लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पाश्चात्य इतिहास विभाग (Department of Western History) के सहायक आचार्य डॉ. आशुतोष सिंह का शोध पत्र “India’s Nuclear Posture Under Stress: The Future of Recessed Deterrence” प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Journal of World Affairs: Voice of the Global South, सेज (SAGE) में प्रकाशित हुआ है। यह शोध भारत की परमाणु नीति, सामरिक सुरक्षा, समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता और बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा परिवेश का विश्लेषण करता है।
सिपरी रिपोर्ट 2026 और समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विश्लेषण:
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2026 की रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि भारत ने अपनी किसी एक परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) पर लगभग 12 परमाणु वारहेड तैनात किए हो सकते हैं। इस आकलन ने भारत की पारंपरिक ‘रिसेस्ड डिटरेंस’ (Recessed Deterrence) व्यवस्था की प्रासंगिकता पर बहस को जन्म दिया है। इस व्यवस्था में शांतिकाल के दौरान परमाणु वारहेड और उनकी प्रक्षेपण प्रणालियों को अलग रखा जाता है तथा परमाणु बलों को अपेक्षाकृत कम परिचालन तत्परता पर बनाए रखा जाता है।
डॉ. सिंह के शोध के अनुसार, उपलब्ध साक्ष्य भारत की घोषित ‘नो फर्स्ट-यूज’ (NFU) नीति अथवा ‘क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस’ (CMD) के मूल सिद्धांतों में औपचारिक बदलाव की पुष्टि नहीं करते। हालांकि, विश्वसनीय जवाबी परमाणु हमले की क्षमता बनाए रखने की आवश्यकताओं और चीन की बढ़ती सामरिक क्षमताओं के कारण भारत की पारंपरिक परिचालनगत परमाणु मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है।
शोध पत्र के प्रमुख निष्कर्ष:
मूल परमाणु नीति की निरंतरता: भारत की परमाणु नीति अब भी NFU, CMD और सुनिश्चित जवाबी कार्रवाई के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। इनके औपचारिक परित्याग के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विकास: आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जैसी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों तथा के-15 और के-4 पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBMs) का विकास भारत की समुद्र-आधारित जवाबी परमाणु क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘रिसेस्ड डिटरेंस’ पर बढ़ता दबाव: समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के संचालन में कुछ परिस्थितियों में वारहेड और प्रक्षेपण प्रणालियों को संयोजित अवस्था में रखना आवश्यक हो सकता है। इससे पारंपरिक ‘रिसेस्ड डिटरेंस’ व्यवस्था की परिचालनगत सीमाएँ उजागर होती हैं।
चीन की सामरिक क्षमताओं का प्रभाव: चीन के बढ़ते परमाणु शस्त्रागार, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) तथा उन्नत सटीक प्रहार तकनीकों ने भारत की परमाणु प्रतिरोधक रणनीति के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं।
परिचालनगत अनुकूलन, न कि निर्णायक नीतिगत बदलाव: अध्ययन में भारत की परमाणु मुद्रा में क्रमिक अनुकूलन और ‘रिसेस्ड डिटरेंस’ के आंशिक क्षरण के संकेत मिलते हैं। हालांकि, निरंतर समुद्री परमाणु प्रतिरोधक गश्त (CASD) अथवा चेतावनी मिलते ही परमाणु प्रक्षेपण (LOW) की व्यवस्था अपनाने के स्पष्ट सार्वजनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
शोध का व्यापक महत्व:
यह अध्ययन रेखांकित करता है कि भारत की परमाणु नीति और उसकी परिचालनगत परमाणु मुद्रा का आकलन अलग-अलग किया जाना चाहिए। शोध का केंद्रीय निष्कर्ष है कि भारत की मूल परमाणु नीति में औपचारिक परिवर्तन के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, जबकि समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकताओं, चीन की बढ़ती सामरिक क्षमताओं और तकनीकी विकास के कारण उसकी परिचालनगत परमाणु मुद्रा में क्रमिक अनुकूलन हो रहा है। इस प्रकार, भारत की पारंपरिक ‘रिसेस्ड डिटरेंस’ व्यवस्था का पूर्ण परित्याग नहीं, बल्कि उस पर बढ़ते दबाव और उसके आंशिक रूपांतरण को वर्तमान परिस्थितियों में अधिक उपयुक्त ढंग से समझा जा सकता है।
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