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‘भारतीय भावैक्य’ विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ, 24 से अधिक भारतीय भाषाओं के 460 से अधिक मुहावरों का होगा सत्यापन

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केंद्र में कला संकाय स्थित भाषाविज्ञान विभाग एवं भारत अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वाधान में भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित ‘मुहावरों के माध्यम से भारतीय भावैक्य’ विषय तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ मंगलवार को भारत अध्ययन केंद्र में हुआ। इस कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित मुहावरों एवं मुहावरेदार अभिव्यक्तियों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से उनमें निहित साझा भावनाओं, सांस्कृतिक अनुभवों और विचारों को समझना तथा भारतीय भाषाओं के बीच विद्यमान सांस्कृतिक समानताओं और भावगत संबंधों की पहचान करना है।कार्यशाला के तीन दिवसीय अकादमिक विमर्श का प्रमुख परिणाम इन मुहावरों के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों पर आधारित एक मोनोग्राफ (विशेष शोधग्रंथ) तैयार करना होगा, जिसका प्रकाशन भारतीय भाषा समिति द्वारा किया जाएगा। यह शोधग्रंथ विभिन्न भारतीय भाषाओं के मुहावरों के भाषाई एवं सांस्कृतिक विश्लेषण को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करेगा।कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी रहे, उन्होंने अपने वक्तव्य में अंतर्विभागीय संवाद और सहयोग के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है और इसका पूरा उपयोग तभी संभव है जब विभिन्न विभागों एवं संकायों के बीच स्थापित सीमाओं से आगे बढ़कर परस्पर सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में केवल अपने विभाग या संकाय तक सीमित रहने के बजाय अन्य विभागों के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सहभागिता भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि मुहावरों का अध्ययन केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि राजनीति, समाज, संस्कृति और कंप्यूटर विज्ञान जैसे विविध विषयों के संदर्भ में भी किया जा सकता है। इस प्रकार के अंतर्विषयी अध्ययन से शोध का दायरा व्यापक होगा और विषयों को समझने की दृष्टि अधिक समृद्ध होगी। उन्होंने विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों एवं संकायों के बीच संवाद, सहयोग और अकादमिक सहभागिता को बढ़ावा देने का आह्वान किया।कार्यशाला के मुख्य अतिथि प्रो. एम. जे. वारसी, अध्यक्ष, भाषाविज्ञान विभाग एवं लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ इंडिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से समृद्ध सभ्यता है। प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्ट पहचान है फिर भी उनमें भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर गहरी समानताएँ विद्यमान हैं। भारतीय बहुभाषिकता हमारी विविधता में एकता और साझा सभ्यतागत विरासत का आधार है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में प्रचलित मुहावरों का तुलनात्मक अध्ययन हमें उनके अर्थ, बिंबों और संप्रेषण की समान परंपराओं को समझने का अवसर देता है। इन मुहावरों का व्यवस्थित संकलन, दस्तावेजीकरण और प्रकाशन हमारी साझा भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए प्रो. वारसी ने कहा बहुभाषिकता राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। मातृभाषा, घरेलू भाषा, स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने भारतीय भाषाओं की ज्ञान-परंपरा पर बल देते हुए कहा कि पाणिनि की अष्टाध्यायी और तमिल की तोलकाप्पियम जैसी रचनाएँ भारतीय भाषाई चिंतन की समृद्ध परंपरा का परिचय देती हैं। भारतीय भाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं हैं बल्कि वे हमारी संस्कृति, संस्कारों, स्मृतियों और बौद्धिक विरासत को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।कार्यशाला में कला संकाय की संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि वर्तमान समय में मुहावरों के अध्ययन और उनके पुनर्स्मरण की आवश्यकता है ताकि उन्हें समकालीन परिस्थितियों और नई पीढ़ी के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में मुहावरों की अभिव्यक्ति भले ही अलग-अलग हो लेकिन उनके पीछे निहित भावनाएँ और संवेदनाएँ अनेक स्तरों पर समान हैं। यही समानता भाषाई विविधता के बीच एकता स्थापित करती है और भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ती है।कार्यक्रम में स्वागत भाषण देते हुए कार्यशाला के सह-संयोजक एवं भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. शारदिन्दु कुमार तिवारी ने अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कार्यशाला के विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए भारतीय भाषाओं में प्रचलित मुहावरों के अध्ययन और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को समझने के महत्त्व पर चर्चा की। कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रवीण गटला, स्थानीय समन्वयक, ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा भाषाविज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. अभिनव कुमार मिश्र कार्यशाला के संयोजक रहे। भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. पी. धनी कृष्णा, भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष एवं कार्यशाला के संयोजक प्रो. अभिनव कुमार मिश्रा सहित शोधार्थि, विधार्थि तथा अन्य गणमान्य अतिथिगण उपस्थित रहे।

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