लखनऊ। पर्यावरण विज्ञान और औषधीय वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। आमतौर पर पराबैंगनी विकिरण यानी अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों को समस्त जीव-जगत, वनस्पतियों और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है, किंतु लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अवंतिका पांडेय के मुख्य नेतृत्व में किए गए एक ताजा अध्ययन ने इस पारंपरिक धारणा को नई वैज्ञानिक दिशा दी है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के सहयोग से संपन्न इस अध्ययन में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि संकटग्रस्त औषधीय पौधे सोरेलिया कोरीलिफोलिया (Psoralea corylifolia)—जिसे लोकभाषा में ‘बाकुची’ कहा जाता है—पर अतिरिक्त UV-B विकिरण पड़ने से उसके जीवनरक्षक औषधीय यौगिकों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
पौधों की आत्मरक्षा प्रणाली और सक्रिय औषधीय यौगिकों में वृद्धि:
वैज्ञानिकों के अनुसार पौधे गतिशील नहीं होते, इसलिए प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों और तनावों से बचने के लिए वे अपना स्थान नहीं बदल सकते। तनावपूर्ण परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना करने और स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए पौधे अपने भीतर एक विशिष्ट व जटिल रासायनिक रक्षा तंत्र विकसित करते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर किए गए इस शोध में पाया गया कि बाकुची के पौधों को जब अतिरिक्त UV-B विकिरण के संपर्क में रखा गया, तो उनके बीजों में बाकुचियोल (Bakuchiol), सोरालेन (Psoralen) और आइसोसोरालेन (Isopsoralen) जैसे अत्यधिक मूल्यवान रासायनिक यौगिकों की सांद्रता में भारी इजाफा दर्ज किया गया। उल्लेखनीय है कि ये दुर्लभ फाइटोकेमिकल्स पारंपरिक व आधुनिक चिकित्सा में विटिलिगो (सफेद दाग), सोरायसिस तथा विभिन्न त्वचा विकारों व गंभीर सूजन के उपचार में प्रमुखता से उपयोग किए जाते हैं। इसके साथ ही वर्तमान में इन सक्रिय तत्वों के शक्तिशाली कैंसर-रोधी (Anti-cancer) और बढ़ती उम्र के लक्षणों को रोकने वाले एंटी-एजिंग (Anti-aging) गुणों पर विश्वभर में गहन अनुसंधान चल रहा है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि UV-B किरणों के प्रभाव में विकसित बीजों के अर्क ने शरीर के लिए घातक साबित होने वाले फ्री-रेडिकल्स को निष्प्रभावी करने की कहीं अधिक एंटीऑक्सीडेंट क्षमता प्रदर्शित की।
प्राकृतिक परिस्थितियों में क्रोमियम प्रदूषण और ‘को-टॉलरेंस‘ का सफल परीक्षण:
यह अनूठा अध्ययन कृत्रिम वातावरण के बजाय प्राकृतिक बाहरी परिस्थितियों में संपन्न किया गया। इसमें सामान्य वातावरण, भारी धातु क्रोमियम से दूषित मिट्टी, अतिरिक्त UV-B विकिरण तथा दोनों तनावों (UV-B + क्रोमियम) के संयुक्त प्रभाव का गहन तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। शोध का सबसे उत्साहजनक परिणाम यह रहा कि भारी धातु क्रोमियम की विषाक्त मौजूदगी के बावजूद UV-B विकिरण का सकारात्मक औषधीय प्रभाव लगातार बना रहा। बाकुची के बीजों ने मिट्टी से अपेक्षाकृत बहुत कम क्रोमियम अवशोषित किया, और UV-B के संपर्क ने क्रोमियम के बीजों तक पहुंचने की मात्रा को और भी अधिक सीमित कर दिया। हालांकि बीजों की कुल संख्या में मामूली गिरावट देखी गई, लेकिन बीजों के समग्र आकार, गठन और वजन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। यह शोध जीवविज्ञान में ‘को-टॉलरेंस (Co-tolerance)’ की अवधारणा को भी मजबूत वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है, जिसका अभिप्राय है कि किसी एक तनाव (UV-B) के संपर्क में आने से पौधे में अन्य दूसरे पर्यावरणीय तनावों (जैसे भारी धातु प्रदूषण) को सफलतापूर्वक सहन करने की आंतरिक क्षमता स्वतः विकसित हो जाती है।
किसानों, समाज और संकटग्रस्त प्रजाति संरक्षण के लिए दूरगामी लाभ:
लखनऊ विश्वविद्यालय के इस शोध के परिणाम औषधीय, कृषि और पर्यावरणीय तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
* वैज्ञानिक व प्राकृतिक खेती का मार्ग प्रशस्त: मूल्यवान औषधीय तत्वों की पैदावार बढ़ाने के लिए यह पूरी तरह प्राकृतिक मार्ग सुझाता है। बाकुची को अधिक धूप और प्राकृतिक UV वाले शुष्क क्षेत्रों में उगाकर किसान कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाली औषधीय उपज ले सकते हैं।
* हल्की प्रदूषित भूमि का सदुपयोग: औद्योगिक अपशिष्टों से हल्की प्रदूषित मिट्टी में भी इसकी सुरक्षित खेती किसानों के लिए एक लाभकारी और सुरक्षित विकल्प बन सकती है।
* संकटग्रस्त प्रजाति का संरक्षण: यह शोध बाकुची जैसी विलुप्तप्राय व संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण, जीन-स्तर पर सुरक्षात्मक क्रियाविधियों को समझने और भविष्य में पर्यावरणीय बदलावों के अनुकूल फसलें विकसित करने में मील का पत्थर साबित होगा। यह शोध पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया, सेक्शन बी: बायोलॉजिकल साइंसेज’ (Proceedings of the National Academy of Sciences, India, Section B: Biological Sciences – Springer) में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है।
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