लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय कानून केवल संधियों और अदालतों के बल पर बाध्यकारी नहीं बनता। उसकी असली शक्ति राष्ट्रों के बीच आपसी भरोसे, संवाद और साझा नैतिक मूल्यों से आती है। यह बात हैसेल्ट विश्वविद्यालय, बेल्जियम एवं शंघाई जियाओ टोंग विश्वविद्यालय, चीन के प्रोफेसर तथा मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो प्रो. (डॉ.) मैथियास वैनहुलेबुश ने बुधवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय में आयोजित ऑनलाइन अतिथि व्याख्यान में कही। “द थ्योरी ऑन द रिलेशनल नॉर्मेटिविटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ” (अंतरराष्ट्रीय कानून की संबंधपरक मानकता का सिद्धांत) विषय पर यह व्याख्यान कुलपति प्रो. (डॉ.) जय प्रकाश सैनी एवं विधि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. (डॉ.) रमेश कुमार वर्मा के संरक्षण में आयोजित हुआ। कार्यक्रम निदेशक प्रो. (डॉ.) वरुण छाछर रहे। ज़ूम के माध्यम से आयोजित इस कार्यक्रम में संकाय के शिक्षकगण, शोधार्थी और विधि के विद्यार्थी बड़ी संख्या में जुड़े। प्रो. वैनहुलेबुश ने व्याख्यान की शुरुआत एक बुनियादी प्रश्न से की: आज पश्चिम में और पश्चिम द्वारा लिए गए निर्णय शेष विश्व को स्वीकार्य क्यों नहीं रह गए हैं? सिंगापुर के विद्वान किशोर महबूबानी को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक “शतरंज की बिसात” पहले से कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि इसमें पहली बार कई बड़ी गैर-पश्चिमी शक्तियाँ प्रवेश कर चुकी हैं। अब विश्व को प्रभावित करने वाले फैसले केवल कुछ पश्चिमी राजधानियों में नहीं लिए जा सकते। उन्होंने सैमुअल हंटिंगटन की उस चेतावनी का भी उल्लेख किया कि पश्चिमी संस्कृति को सार्वभौमिक मानने की धारणा “असत्य, अनैतिक और ख़तरनाक” है। उन्होंने कहा कि इतिहास, दर्शन, धर्म-अध्ययन और मानवशास्त्र जैसे पारंपरिक विषय भी सीमित हैं, क्योंकि वे मुख्यतः पश्चिमी सिद्धांतों और पश्चिमी अनुभवों पर आधारित हैं। इसलिए नया आरंभ-बिंदु “ज्ञानमीमांसा” होना चाहिए, यानी यह समझना कि अलग-अलग समाज वास्तविकता को किस तरह देखते और समझते हैं। मनोवैज्ञानिक रिचर्ड निस्बेट के अध्ययन का हवाला देते हुए उन्होंने एक चित्र के माध्यम से समझाया कि एक ही दृश्य को पश्चिमी और एशियाई लोग अलग-अलग ढंग से देखते हैं। पश्चिमी सोच वस्तु पर केंद्रित होती है, उसे दूसरों से अलग कर निश्चित श्रेणियों में बाँटती है, और यही व्यक्तिवादी समाजों को जन्म देती है। एशियाई सोच संदर्भ पर केंद्रित होती है। वह किसी वस्तु को दूसरों से उसके संबंधों के आधार पर परिभाषित करती है, और ये संबंध निरंतर बदलते रहते हैं। यही सोच सामुदायिक समाजों का आधार बनती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इसे लागू करते हुए उन्होंने कहा कि यथार्थवाद, उदारवाद और रचनावाद जैसे पश्चिमी सिद्धांत राष्ट्रों, संगठनों और उनके हितों को विश्लेषण की मूल इकाई मानते हैं, जबकि एशियाई दृष्टि राष्ट्रों के बीच के संबंधों को केंद्र में रखती है। इसीलिए संबंधपरक चिंतन पर आधारित एक नए सिद्धांत की आवश्यकता है। उन्होंने चीनी विद्वान किन याछिंग की “संबंधपरक शासन” (रिलेशनल गवर्नेंस) की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की। इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्थाएँ बनाना जिनसे समुदाय के सदस्य आपसी भरोसे, साझा मानदंडों और नैतिकता के आधार पर सहयोगपूर्ण व्यवहार करें। ब्रेक्सिट, यूरोपीय संघ–कनाडा व्यापार समझौता, आसियान क्षेत्रीय मंच, बेल्ट एंड रोड पहल और विश्व व्यापार संगठन के दोहा दौर जैसे उदाहरणों से उन्होंने इसे स्पष्ट किया। साथ ही उन्होंने इस अवधारणा की सीमाएँ भी स्पष्ट रूप से रखीं: यह अमूर्त है, अनिश्चित है और अति-व्यापक भी। व्याख्यान का केंद्रीय बिंदु उनका अपना सिद्धांत रहा। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून अक्सर इसलिए विफल नहीं होता कि नियम नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि नियम काग़ज़ पर तो स्वीकार किए जाते हैं पर व्यवहार में लागू नहीं होते। इसलिए पहले राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध और भरोसा बनाना होगा, और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय कानून लागू करना होगा, न कि इसके उलट। “भरोसे बनाम अविश्वास” के पैमाने पर संबंधों की प्रकृति ही तय करती है कि कानून का पालन होगा या नहीं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के अनुच्छेद 38 में वर्णित अंतरराष्ट्रीय कानून के स्रोतों, यानी संधियाँ, प्रथा और विधि के सामान्य सिद्धांत, की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ये तीनों परस्पर निर्भर हैं और संबंधपरक शासन इन्हें पोषित करता है। उर्वर भूमि के बिना मानदंड अपना बाध्यकारी प्रभाव नहीं दिखा सकते। अंत में उन्होंने महबूबानी के शब्दों में आशा जताई कि विश्व का “वि-पश्चिमीकरण” एक ऐसी सकारात्मक दिशा में ले जाए, जहाँ अनेक समृद्ध प्राचीन सभ्यताएँ पुनर्जीवित हों और सांस्कृतिक सहिष्णुता व आपसी समझ को बढ़ावा मिले। कार्यक्रम निदेशक प्रो. वरुण छाछर ने इस वर्ष के आरंभ में फ्रांस एवं अन्य यूरोपीय देशों की अपनी यात्रा के दौरान विभिन्न यूरोपीय संस्थानों में शोध के माध्यम से वहाँ के अकादमिक जगत से संबंध सुदृढ़ किए थे। उन्होंने कहा कि ऐसे आदान-प्रदान से वैश्विक विद्वत्ता सीधे लखनऊ के विद्यार्थियों तक पहुँचती है। “आज हमारे विद्यार्थियों ने एक ऐसे सिद्धांत को प्रत्यक्ष सुना जो बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका से सीधे जुड़ा है। विधि संकाय ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय अकादमिक संवाद को आगे बढ़ाना चाहता है,” उन्होंने कहा। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें मुख्य वक्ता, कुलपति, अधिष्ठाता, संकाय के शिक्षकगण, तकनीकी टीम एवं सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। प्रो. वैनहुलेबुश ने इस संवाद को दोनों संस्थानों के बीच नए सहयोग की शुरुआत बताया।
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