लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में एक बैठक का आयोजन हुआ। जिसमें मुख्य विषय जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप हो रहे पर्यावरणीय बदलाव, प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति, प्राकृतिक संसाधनों में कमी तथा जैव संपदा, खाद्य संपदा एवं वन संपदा पर पड़ने वाले प्रभावों के साथ-साथ समुद्र के जलस्तर में हो रहे बदलावों के परिप्रेक्ष्य में अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के संरक्षण हेतु प्रभावी उपायों पर विचार-विमर्श करना रहा। इसी उद्देश्य से अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण, जैव-विविधता के संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को न्यूनतम करने के लिए आज लखनऊ विश्वविद्यालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में द्वीपसमूह के विकास को पर्यावरणीय संरक्षण के साथ संतुलित करने तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी समाधानों के माध्यम से स्थानीय चुनौतियों का सामना करने पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। बैठक में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल प्रो. दिनेश शर्मा जी के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे. पी. सैनी जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। बैठक की मेजबानी प्रो. ध्रुव सेन सिंह, निदेशक, हाइड्रोकार्बन, ऊर्जा एवं भू-संसाधन संस्थान द्वारा हाइड्रोकार्बन, ऊर्जा एवं भू-संसाधन संस्थान, ओएनजीसी भवन, लखनऊ विश्वविद्यालय में की गई। प्रो. ध्रुव सेन सिंह, निदेशक, हाइड्रोकार्बन, ऊर्जा एवं भू-संसाधन संस्थान, प्रो. सी. आर. गौतम, निदेशक, खाद्य प्रसंस्करण एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, प्रो. अमिता कनौजिया, निदेशक, वन्यजीव विज्ञान संस्थान, प्रो. डॉ. मोनिशा बनर्जी, निदेशक, उन्नत आणविक आनुवंशिकी एवं संक्रामक रोग संस्थान, प्रो. पुनीत मिश्रा, निदेशक, उन्नत संगणन विकास संस्थान (IDAC), प्रो. विनीत कुमार वर्मा, अधीक्षक, निर्माण विभाग एवं गणित एवं खगोल विज्ञान विभाग, सहायक प्रोफेसर मनोज कुमार यादव, भूविज्ञान विभाग बैठक का प्रमुख विषय अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के विकास के साथ प्राकृतिक पर्यावरण और जैव-विविधता के संरक्षण को सुनिश्चित करना रहा। विशेषज्ञों ने द्वीपसमूह की विशिष्ट पारिस्थितिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता पर चर्चा की, जिससे स्थानीय पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव पड़े तथा प्राकृतिक संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने तथा उसके अनुरूप विकास की रणनीतियां तैयार करने पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त समुद्री जल के विलवणीकरण (Desalination) के लिए प्रभावी, ऊर्जा-कुशल एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों के उपयोग पर भी विशेष चर्चा हुई। द्वीपसमूह में मीठे जल की उपलब्धता और जल सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुए आधुनिक विलवणीकरण तकनीकों के विकास तथा उनके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं पर विचार किया गया।बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भूविज्ञान, जल संसाधन, जैव-विविधता, खाद्य प्रौद्योगिकी, उन्नत संगणन, गणितीय मॉडलिंग और पर्यावरण विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच समन्वय स्थापित कर अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के लिए वैज्ञानिक एवं दीर्घकालिक विकास की प्रभावी कार्य योजना तैयार की जा सकती है। उपराज्यपाल प्रो. दिनेश शर्मा जी ने सभी सुझावों को सराहनीय बताते हुए कहा कि लखनऊ विश्वविद्यालय की बहु-विषयक विशेषज्ञता द्वीप समूह को जलवायु-अनुकूल, पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित और सतत विकास का एक सुदृढ़ मॉडल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। बैठक का उद्देश्य विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए वैज्ञानिक सहयोग को आगे बढ़ाना रहा।
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