वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अंतर्गत “रिदम्स ऑफ भारत: सेलिब्रेशन ऑफ फ्रीडम, कल्चर एंड यूनिटी” कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र द्वारा आयोजित चार दिवसीय कार्यक्रम में अकादमिक चर्चाओं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों एवं प्रतियोगिताओं के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों का उत्सव मनाया जा रहा है। कार्यक्रम के उद्घाटन दिवस पर “ट्रिब्यूट टू द रेवोल्यूशनरी फ्रीडम फाइटर्स: द अनसंग हीरोज ऑफ भारत” विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि बीएचयू “लघु भारत” का प्रतिनिधित्व करता है, जहां देश की विविधता अपने व्यापक रूप में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में विभिन्न विधाओं का एक साथ होना इसे विशिष्ट बनाता है। उन्होंने सभी से महामना मदन मोहन मालवीय के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए बड़े और सार्थक कार्य करने का प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम उन महान क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।संगोष्ठी के विषय पर विचार रखते हुए बर्दवान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. स्मृति कुमार सरकार ने कहा कि हमें देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने बीरेन्द्र नाथ दासगुप्ता और यतीन्द्र नाथ के योगदान का उल्लेख किया तथा नलिनी कान्त बागची और बंगाल के कई अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर प्रकाश डाला।प्रो. सरकार ने तरिणी कान्त मजूमदार, शांति घोष, सुनीति चटर्जी, बरुण भट्टाचार्य, प्रद्योत भट्टाचार्य, मतिलाल मलिक, ननीबाला देवी, दुकारीबाला देवी, निकुंजबिहारी पाल, श्रीशचन्द्र मित्रा, कनाईलाल भट्टाचार्य, कनाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस सहित कई अल्पज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों से पहले भी अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने क्रांतिकारी गतिविधियों में अपने प्राण न्योछावर किए, लेकिन इतिहास में उनके योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने नई पीढ़ी को इन अनसुने नायकों के योगदान से परिचित कराने तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिन्द फौज की भूमिका को भी उचित रूप से सामने लाने की आवश्यकता बताई।काजी नजरुल विश्वविद्यालय, आसनसोल के प्रो. अमिताव चटर्जी ने महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें बाघा जतिन के नाम से जाना जाता है, के जीवन और योगदान पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार ब्रिटिश शासन ने बंगाल के लोगों को कमजोर और साहसहीन बताकर उनके मनोबल को प्रभावित करने का प्रयास किया। बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने बाघा जतिन जैसे क्रांतिकारियों को संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित किया।प्रो. चटर्जी ने बाघा जतिन पर स्वामी विवेकानन्द के प्रभाव और युगांतर पार्टी जैसे क्रांतिकारी संगठनों के निर्माण में उनकी भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि बाघा जतिन के कार्यों से सुभाष चन्द्र बोस भी प्रभावित हुए थे। विदेशी इतिहासकारों के विवरण और अभिलेखीय स्रोतों के आधार पर उन्होंने बाघा जतिन के जीवन और योगदान के विभिन्न पक्षों को सामने रखा। उन्होंने बताया कि बंगाल के अखाड़े युवाओं को एकत्र करने, उन्हें सशक्त बनाने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध गतिविधियों की योजना बनाने के महत्वपूर्ण केन्द्र बने।उन्होंने बाघा जतिन के प्रेरणा-स्रोतों में भगवद्गीता, स्वामी विवेकानन्द, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और भोलानन्द गिरि महाराज का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि बाघा जतिन ने दुर्गा पूजा जैसे सामाजिक अवसरों का उपयोग लोगों को एकजुट करने के लिए किया। अरविन्द घोष के नेतृत्व में उन्होंने बंगाल में एक बड़े और सक्रिय क्रांतिकारी संगठन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने सहयोगी एम. एन. राय को क्रांतिकारियों के लिए सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से जर्मनी भेजा था।भारत सरकार के पूर्व राजनयिक एवं विशिष्ट अतिथि श्री मनजीव सिंह पुरी ने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारत को गौरवान्वित करने वाला संस्थान है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने 2010 में भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़े अभिलेखों के दस्तावेजीकरण और प्रकाशन का कार्य शुरू किया, जो 2019 में पांच खंडों के प्रकाशन के साथ पूरा हुआ।श्री पुरी ने आजाद हिन्द फौज के प्रभाव तथा स्वतंत्रता सेनानी मोहन सिंह और INA के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आजाद हिन्द फौज ने स्वतंत्रता से पहले भारतीय भूमि पर पहली बार तिरंगा फहराया और भारतीयों के मन में यह विश्वास मजबूत किया कि ब्रिटिश सेना को चुनौती दी जा सकती है। उन्होंने 1946 के ब्रिटिश भारतीय नौसेना क्रांति का भी उल्लेख किया, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव को और कमजोर किया।स्वागत वक्तव्य में मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र की समन्वयिका प्रो. सुतापा दास ने कहा कि यह कार्यक्रम भारत की विविधता और सभ्यता को सामने रखने के साथ-साथ बीएचयू के विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच भी प्रदान करेगा। डॉ. उषा त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।कार्यक्रम में प्रो. शिवाशंकरी, प्रो. संदीप चटर्जी, डॉ. नवीन सुकुमारन, प्रो. प्रवेश भारद्वाज, प्रो. ध्रुब कुमार सिंह, डॉ. सुरेश नायर, डॉ. धर्मजंग, डॉ. राजीव कुमार वर्मा, डॉ. रमेश लाल और डॉ. कमला राम बिन्द सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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