गाजीपुर। ताड़ीघाट-बारा मार्ग स्थित गहमर के पास करहिया गांव के मां कामाख्या मंदिर में शारदीय नवरात्र के पहले दिन 11 अक्टूबर रविवार को भक्त दर्शन-पूजन को पहुंचेंगे। इस मंदिर की पौराणिक मान्यता यह है कि यह सकरवार वंश की कुल देवी हैं। सकरवार वंश के लोग अपनी कुलदेवी मां कामाख्या को फतेहपुर सिकरी से लेकर चले थे। इस मंदिर की स्थापना सन 1526 में हुई थी, तबसे लेकर आजतक 18 पीढ़ियों से मां का पूजा अर्चन पारंपरिक ढंग से किया जाता है। ये सिद्धपीठ काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है और कहा जाता है कि यहां मांगी गई हर मनोकामनाएं पूर्ण होती है। कामाख्या धाम में वैसे तो हमेशा श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्र में यहां आसपास के जिलों के साथ ही बिहार प्रदेश के लोग भी दर्शन पूजन करने आते हैं। मां के प्रसाद के रूप में गुड़ का शर्बत दिया जाता है। गाजीपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर एशिया का सबसे बड़ा गांव गहमर जहां यह ताड़ीघाट-बारा मार्ग पर मंदिर स्थित है। वहां हर घर से एक सिपाही फौज में हैं। माता की कृपा से आज तक इस गांव का एक भी सिपाही शहीद नहीं हुआ है। मान्यता है कि मां कामाख्या अपने बेटों की रक्षा के लिए खुद सरहद पर पहुंच जाती हैं, और उनकी हिफाजत करती हैं। यह भी मान्यता है कि जब-जब सरहद पर कोई बड़ा युद्ध होता है, तो यहां माता का पूजन-अर्चन बंद कर दिया जाता है। क्योंकि ऐसा लोगों का मानना है कि युद्धकाल में माता अपने पुत्रों की रक्षा के लिए सरहद पर चली जाती हैं। बताया जाता है कि मध्यकाल में जब भारत पर बाबर ने आक्रमण किया था तत्कालीन समय में उसके क्रूरता के कारण सारे भारतीय प्रभावित थे। जब बाबर और राणा सांगा सिंह के बीच खानवा का युद्ध प्रारम्भ हुआ था, तो उस युद्ध मे अनेक राजवंश भी संग्राम सिंह के तरफ से लड़े थे। उसी लड़ने वालों में एक थे धामदेव राव। जब खानवा के युद्ध में बाबर विजयी हुआ, तो उसने हिन्दू राजाओ पर अत्याचर करना शुरू कर दिया। इसके कारण मेवाड़, फतेहपुर सीकरी इत्यादि का क्षेत्र अशांत एवम असुरक्षित हो गया था। तत्कालीन समय में धामदेव राव के कुलपुरोहित बाबा गंगेश्वर थे। इनकी शिव एवम शक्ति में अपार श्रद्धा थी। वह मां कामाख्या के अनन्य भक्त थे। उनकी भक्ति की पराकाष्ठा यहां तक थी कि शुभाशुभ कोई भी घटना मां उन्हें स्वप्न में आकर बता देती थी। उन्ही का छोटा सा विग्रह रखकर वे उनकी उपासना करते थे। इधर मुग़लो का अत्याचार दिन-दूना रात चौगुना बढ़ रहा था। एक दिन की बात है मां कमाख्या ने स्वप्न में आकर बताया कि तुम लोग मेरे संतान हो, अब यहां अधिक दिनों तक रहना तुम्हारे हित में नही होगा।स्वप्न की बात बाबा गंगेश्वर ने धामदेव राव को बताया। धामदेव राव अपने कुलपुरोहित की बात मानकर, अपने लोगों को साथ लेकर सकराडीह की तरफ प्रस्थान कर दिए। साथ में मां कमाख्या विग्रह भी था।मार्ग में एक जगह धामदेव राव ने देखा कि चूहा, बिल्ली का पीछा कर रहा था। इस दृश्य को देखकर उनके मन में बड़ा ही कौतूहल हुआ एवम अपने पुरोहित से इस दृश्य का कारण जाना। इस जगह पर यह घटना हुई थी, वही पर मां कमाख्या का विग्रह स्थापित करके उनका पूजन करने लगे। वहां बहुत बड़ा जंगल था। आरंभ में जंगल के बीच एक छोटा सा मन्दिर बना। जहा नित्य मां का आराधना होने लगा। कालांतर बीसवीं सदी के अंत से अब तक यह छोटा मन्दिर भव्य मंदिर के स्वरूप में बदल गया। आज वह सकराडीह में मां कमाख्या का मंदिर एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है। जहां दर्शन एवम पूजा-पाठ के लिए लोग सुदूर देशों से आते हैं। शारदीय नवरात्र के लिए मंदिर के प्रबंध कमेटी ने साफ-सफाई सहित हर व्यवस्था को पूर्ण कर लिया है। जिससे आने वाले भक्तों को कोई कठिनाई का सामना न करना पड़े। सुरक्षा व्यवस्था के संदर्भ में सेवराई चौकी इंचार्ज शिव प्रसाद ने पूर्वांचल न्यूज डाट काम को बताया कि नवरात्र में पूरे मंदिर परिसर की चाक चौबंद व्यवस्था की गयी है। मंदिर में आने वाले हर भक्तों का सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित किया जायेगा जिससे कि किसी को परेशानी न हो। अराजक तत्वों पर कड़ी नजर रहेगी। गड़बड़ी फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होने बताया कि मंदिर के आस-पास के क्षेत्रों में भी पुलिस चक्रमण कर रही है।
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