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लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिर्विज्ञान विभाग की स्थापना के रजत जयंती वर्ष पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोले कुलपति- ज्योतिष विद्या पूर्णतः वैज्ञानिक

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिर्विज्ञान विभाग के रजत जयंती वर्ष (25वें स्थापना वर्ष) के उपलक्ष्य में विभाग के वराहमिहिर सभागार में “ज्योतिर्विज्ञान की मूलकता और वैज्ञानिकतत्व” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (सेमिनार) का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ शंखनाद और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। तत्पश्चात सत्य प्रकाश शुक्ल, पंकज द्विवेदी और राम आशीष द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया एवं आगत अतिथियों का स्वागत हुआ। संगोष्ठी की विषय-प्रवर्तन रखते हुए डॉ. श्यामलेश कुमारी तिवारी ने विभाग की 25 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के निर्गत शासकीय आदेश एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की संस्तुति पर 18 अक्टूबर 2001 (विक्रम संवत् 2058, शुद्ध आश्विन शुक्ल द्वितीया) को तत्कालीन राज्यपाल प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री के कर-कमलों से विभाग की स्थापना हुई थी। यह विभाग कला संकाय के तत्कालीन अधिष्ठाता प्रो. सुरेन्द्र सिंह की पदेन अध्यक्षता, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार कालिया के संरक्षण तथा डॉ. बृजेश कुमार शुक्ल के समन्वयकत्व में स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम के रूप में आरंभ हुआ था। स्थापना के समय स्नातक में 20 और परास्नातक में 15 सीटें थीं। वर्ष 2003 में पीएच.डी. पाठ्यक्रम आरंभ हुआ। वर्तमान में कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरविन्द मोहन के पदेन अध्यक्षत्व में विभाग निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है। अब स्नातक में 30, परास्नातक में 45 सीटें संचालित हैं तथा वर्तमान वर्ष 2026 से परास्नातक (वास्तुशास्त्र) का नवीन पाठ्यक्रम भी प्रारंभ किया गया है। वर्तमान में समाज के विशिष्ट वर्गों—जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, अधिवक्ता, वैज्ञानिक, सेवानिवृत्त बैंक व प्रशासनिक अधिकारी भी सामान्य विद्यार्थियों के साथ ज्योतिर्विज्ञान और वास्तुशास्त्र का अध्ययन कर रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जय प्रकाश सैनी ने कहा कि  “हमारे प्राचीन भारतीय आचार्यों की काल-गणना इतनी उन्नत व सटीक थी जितनी आज भी विस्मयकारी है। ज्योतिष विद्या पूर्णतः वैज्ञानिक है और भारतीय ज्ञान परंपरा के अत्यंत समीप है। इसकी सटीक गणनाओं से लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। यह शास्त्र भविष्य के आकलन में सक्षम है, इसलिए इसका उपयोग मानवता और जनकल्याण के लिए किया जाना चाहिए। वर्तमान समय में आधुनिक तकनीकी उपकरणों के माध्यम से गणनाएं और भी सुगम हो गई हैं। इस विधा में रुचि रखने वाले अध्येताओं को निरंतर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। युवा शोधार्थी इसमें अनवरत शोध करें ताकि समाज और राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति हो सके।” कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. बिंदा प्रसाद मिश्र ने स्थापना काल के संस्मरण साझा करते हुए कहा कि सीमित संसाधनों से शुरू होकर विभाग आज अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच चुका है। उन्होंने तत्कालीन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी और प्रथम समन्वयक स्वर्गीय डॉ. बृजेश कुमार शुक्ल के अमूल्य योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि ज्योतिर्विज्ञान में विद्यार्थियों की जितनी समृद्ध संख्या लखनऊ विश्वविद्यालय में है, उतनी अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। कला संकाय के अधिष्ठाता एवं विभाग के पदेन अध्यक्ष प्रो. अरविंद मोहन ने कहा कि 25 वर्षों की इस यात्रा को वर्तमान समन्वयक डॉ. श्यामलेश जी नई गति प्रदान कर रही हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष से वास्तुशास्त्र का पाठ्यक्रम शुरू किया गया है और भविष्य में फैकल्टी व अन्य संसाधनों के विस्तार के प्रयास निरंतर जारी रहेंगे। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभाग के शिक्षकों—डॉ. विष्णुकांत शुक्ल, डॉ. प्रवीण कुमार बाजपेयी, डॉ. अनुज कुमार शुक्ल सहित लगभग 150 विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने ज्योतिषशास्त्र के विविध सैद्धांतिक व व्यावहारिक विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अनिल कुमार पोरवाल ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बिपिन कुमार पांडेय द्वारा संपन्न हुआ।

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