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बीएचयू में उच्च जोखिम वाले नवजात शिशुओं की निगरानी एवं प्रारंभिक हस्तक्षेप पर सीएमई-सह-कार्यशाला का हुआ आयोजन

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग की नियोनेटोलॉजी इकाई द्वारा सर सुंदरलाल अस्पताल स्थित डॉक्टर्स लाउंज में ‘हाई-रिस्क फॉलो-अप एंड अर्ली इंटरवेंशन’ विषय पर सीएमई-सह-कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हेल्प टू इवैल्यूएट एंड लिव टू फुल पोटेंशियल(HELP) परियोजना का भी शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम को नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम (एनएनएफ) इंडिया, किम्स हेल्थ सीएसआर तथा एनएनएफ वाराणसी का सहयोग प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण ‘फॉलो-अप ऑफ हाई-रिस्क नियोनेट्स बाय नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट’ शीर्षक पुस्तक का विमोचन रहा। इस पुस्तक को चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बीएचयू के बाल रोग विभाग की नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) द्वारा तैयार किया गया है। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने देश में नवजात मृत्यु दर में व्यापक अंतर का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि विभिन्न क्षेत्रों में यह दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 3 से 35 तक है। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बीएचयू में नवजात मृत्यु दर को समझने और नवजात देखभाल के क्षेत्र में संस्थान को क्षेत्रीय आदर्श के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि समाज के कुछ वर्गों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ हैं, जबकि सर सुंदरलाल अस्पताल जैसे संस्थान बड़ी आबादी को आवश्यक चिकित्सा देखभाल, मार्गदर्शन और राहत उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने परिसर से बाहर आसपास के समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने के लिए जागरूकता एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता बताई। इससे ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान संभव हो सकेगा, जिनका उपचार मरीजों के घर के निकट किया जा सकता है, जबकि जटिल मामलों को विश्वविद्यालय के अस्पताल में भेजा जा सकेगा। आधुनिक चिकित्सा संकाय, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संकाय प्रमुख के प्रो. संजय गुप्ता ने उच्च जोखिम वाले नवजात शिशुओं के विकास संबंधी परिणामों में सुधार के लिए समय रहते समस्याओं की पहचान, उचित हस्तक्षेप और नियमित निगरानी के महत्व को रेखांकित किया। सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म और समग्र विकासात्मक विलंब जैसी स्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआती संकेतों की पहचान और उचित देखभाल से इनके दीर्घकालिक प्रभावों को कम किया जा सकता है। सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. पुनीत ने कहा कि यद्यपि ये विकार दुर्लभ हैं, लेकिन बेहतर उपचार परिणामों के लिए समय पर निदान और प्रारंभिक हस्तक्षेप आवश्यक हैं। उन्होंने व्यवस्थित मूल्यांकन तथा मरीजों की शीघ्र पहचान के महत्व पर भी प्रकाश डाला। चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संकाय प्रमुख (अनुसंधान) प्रो. मनोज पांडेय ने आनुवंशिक एवं मेटाबॉलिक विकार, विशेषकर दुर्लभ रोगों के निदान और प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि HELP परियोजना बाल रोग विशेषज्ञों और नियोनेटोलॉजिस्ट को संदिग्ध मामलों की पहचान करने में मार्गदर्शन प्रदान करेगी। उन्होंने भारत में दुर्लभ रोगों की वास्तविक व्यापकता का पता लगाने के लिए जनसंख्या-आधारित अध्ययनों की आवश्यकता पर भी बल दिया। नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम, इंडिया के अध्यक्ष डॉ. ललन के. भारती ने पिछले तीन दशकों में नवजात शिशुओं की जीवन रक्षा के क्षेत्र में भारत की महत्वपूर्ण प्रगति का उल्लेख किया। हालांकि, उन्होंने विभिन्न राज्यों में नवजात मृत्यु दर के बीच व्यापक अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने बेहतर समन्वय, सहयोग तथा कम लागत में अधिक प्रभाव डालने वाले राज्य-विशिष्ट हस्तक्षेपों के माध्यम से प्रयासों को गति देने की आवश्यकता बताई। किम्स हेल्थ की सीएसआर प्रमुख एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री रेश्मी आयशा ने स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में किम्स हेल्थ की कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व संबंधी पहलों की जानकारी दी। उन्होंने दुर्लभ रोगों के निदान एवं उपचार के लिए बेहतर समन्वय, तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय सहायता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि एनएनएफ–किम्स हेल्थ की पहल के अंतर्गत अब तक 11 राज्यों के 90 मरीजों को सहयोग दिया जा चुका है। इससे नवजात देखभाल को बढ़ावा देने के साथ भारत में दुर्लभ रोगों से संबंधित जानकारी और ज्ञान के आधार को मजबूत करने में भी योगदान मिला है। बाल रोग विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट के प्रभारी प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि आनुवंशिक एवं चयापचय संबंधी विकार नवजात मृत्यु के कारणों में शामिल हैं। अनेक मामलों में इन विकारों का निदान नहीं हो पाता और उपचार भी नहीं मिल पाता। उन्होंने नवजात शिशुओं के मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टिसिटी का लाभ उठाने तथा उनके विकासात्मक परिणामों में सुधार के लिए एनआईसीयू देखभाल के महत्व पर बल दिया। किम्स हेल्थ, तिरुवनंतपुरम के समन्वयक एवं वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. नवीन जैन ने दुर्लभ रोगों के निदान में मौजूद कमियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पात्र बच्चों को सरकार समर्थित उपचार योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए समय पर आनुवंशिक एवं चयापचय संबंधी जाँच तथा विशेषज्ञ मार्गदर्शन तक पहुँच आवश्यक है। आयोजन सचिव डॉ. अनु शर्मा ने हेल्प परियोजना की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि एनएनएफ इंडिया की यह पहल किम्स हेल्थ सीएसआर के सहयोग से संचालित की जा रही है। परियोजना के अंतर्गत दुर्लभ आनुवंशिक या चयापचय संबंधी विकारों से ग्रस्त होने की आशंका वाले नवजात शिशुओं के लिए विशेषज्ञ मार्गदर्शन और निःशुल्क निदानात्मक जाँच की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। बाल रोग विभाग, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. अंकुर सिंह ने स्वागत संबोधन दिया। उन्होंने बताया कि दुर्लभ रोगों से संबंधित देखभाल की आवश्यकता ने इस कार्यशाला की परिकल्पना को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, चिकित्सकों और पैरामेडिकल कर्मचारियों के ज्ञान एवं कौशल को सुदृढ़ करेगी। इससे इंडिया न्यूबॉर्न एक्शन प्लान के अंतर्गत नवजात मृत्यु दर को एकल अंक तक लाने के भारत के लक्ष्य की दिशा में भी योगदान मिलेगा। डॉ. दिव्या सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यशाला में बाल रोग विशेषज्ञों, नियोनेटोलॉजिस्ट, बाल रोग विभाग के रेजिडेंट चिकित्सकों और एनआईसीयू नर्सिंग अधिकारियों सहित कुल 45 प्रतिभागियों ने भाग लिया। अकादमिक सत्रों में विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी आयोजित किए गए। इनमें एनआईसीयू के भीतर देखभाल, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद देखभाल एवं नियमित फॉलो-अप और ऑक्यूपेशनल थेरेपी के माध्यम से प्रारंभिक हस्तक्षेप जैसे विषय शामिल रहे। इन सत्रों का उद्देश्य उच्च जोखिम वाले नवजात शिशुओं की व्यवस्थित निगरानी और देखभाल के संबंध में प्रतिभागियों के ज्ञान तथा व्यावहारिक कौशल को मजबूत करना था। कार्यक्रम के दौरान HELP परियोजना का शुभारंभ भी किया गया। एनएनएफ इंडिया, किम्स हेल्थ सीएसआर और चिकित्सा विज्ञान संस्थान, बीएचयू की यह सहयोगात्मक पहल 30 दिन से कम आयु के उन नवजात शिशुओं में दुर्लभ चयापचय एवं आनुवंशिक विकारों का शीघ्र निदान सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगी, जिनमें ऐसे विकार होने की आशंका है। इसका उद्देश्य पात्र मरीजों को भारत सरकार की सहायता-प्राप्त उपचार योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में सहयोग देना भी है।

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