वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान स्थित के. एन. उडुपा सभागार में डीन रिसर्च कार्यालय के तत्वावधान में ‘शोध नैतिकता, प्रकाशन नैतिकता एवं जिम्मेदार शोध’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का उद्देश्य शोधकर्ताओं के बीच नैतिक शोध पद्धतियों, वैज्ञानिक प्रकाशन में उत्तरदायित्व तथा अकादमिक जवाबदेही के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। इसमें विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के शिक्षक, शोधकर्ता, शोधार्थी, चिकित्सक तथा संस्थागत नैतिकता समितियों के सदस्य शामिल हुए। कार्यशाला में वैज्ञानिक शोध और प्रकाशन से जुड़े नैतिक दायित्वों पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अकादमिक समुदाय के कुछ सदस्यों के बीच शोध नैतिकता के प्रति जागरूकता की कमी पर चिंता व्यक्त की और इस दिशा में निरंतर संस्थागत प्रयासों की अनिवार्यता पर चर्चा की। उन्होंने कार्यशाला के आयोजन के लिए डीन रिसर्च की सराहना करते हुए इसे शोध की सत्यनिष्ठा को सुदृढ़ करने और विश्वविद्यालय में उत्तरदायी अकादमिक परंपराओं को बढ़ावा देने का आंतरिक प्रयास बताया।अकादमिक प्रकाशन में जवाबदेही के महत्त्व को बताते हुए प्रो. चतुर्वेदी ने आगाह किया कि “सीमा का उल्लंघन करने वाला एक शोधपत्र भी पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।” उन्होंने कहा कि प्रत्येक लेखक को अपने शोधकार्य की जिम्मेदारी स्वयं लेनी चाहिए और अनभिज्ञता को अनैतिक आचरण का औचित्य नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने शोधपत्रों की संख्या और उद्धरणों की गणना से अधिक नैतिक मानकों को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। साथ ही, नकल और आँकड़ों में हेरफेर जैसी अनियमितताओं को रोकने तथा शोधार्थियों की आने वाली पीढ़ियों में सत्यनिष्ठा की स्थायी संस्कृति विकसित करने के लिए शोध नैतिकता का प्रारंभिक स्तर पर ही प्रशिक्षण देने की आवश्यकता बताई।प्रो. एस. एन. संखवार, निदेशक, आईएमएस-बीएचयू ने कहा कि किसी संस्थान की शोध उत्कृष्टता का वास्तविक आकलन केवल शोधपत्रों की संख्या या उनके उद्धरणों से नहीं बल्कि शोध के प्रति समाज के विश्वास और उससे जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलावों से किया जाना चाहिए। बीएचयू की ज्ञान, सेवा और राष्ट्र निर्माण की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक प्रगति सदैव नैतिक उत्तरदायित्व से निर्देशित होनी चाहिए। उन्होंने आशा व्यक्त किया कि कार्यशाला से प्रतिभागियों को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा-निर्देशों, नियामक ढाँचों और व्यावहारिक नैतिक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी।आयुर्वेद संकाय के संकाय प्रमुख डॉ. के. एच. एच. वी. एस. नरसिम्हा मूर्ति ने शोध नैतिकता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन काल से ही ज्ञान के विकास के साथ नैतिक सिद्धांत जुड़े रहे हैं। आयुर्वेद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में नैतिक सिद्धांतों के साथ-साथ शोध की विधियों का भी वर्णन मिलता है, जिनमें तंत्रयुक्ति से संबंधित पद्धतियाँ भी शामिल हैं।दंत विज्ञान संकाय के प्रभारी संकाय प्रमुख प्रो. आशीष अग्रवाल ने स्वागत उद्बोधन दिया। उन्होंने कार्यशाला को नैतिक शोध पद्धतियों को बढ़ावा देने तथा वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा के प्रति शोधकर्ताओं की समझ विकसित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल बताया।कार्यशाला के तकनीकी सत्रों का संचालन राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने किया। आईसीएमआर-एनसीडीआईआर, बेंगलुरु की आईसीएमआर बायोएथिक्स यूनिट की प्रमुख एवं साइंटिस्ट जी डॉ. रोली माथुर ने आईसीएमआर राष्ट्रीय नैतिक दिशानिर्देशों और नैतिक समीक्षा पर व्याख्यान दिया। आईसीएमआर-एनआईओएच, अहमदाबाद के निदेशक डॉ. भावेश मोदी ने उत्तरदायी शोध आचरण पर विचार रखे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी समन्वयक प्रो. भास्कर भट्टाचार्य तथा डीन रिसर्च प्रो. मनोज पाण्डेय ने प्रकाशन नैतिकता पर व्याख्यान दिया। सीडीएससीओ के सहायक औषधि नियंत्रक (भारत) डॉ. विनय कुमार गुप्ता द्वारा नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 पर तैयार किया गया मुख्य वक्तव्य भी प्रतिभागियों के साथ साझा किया गया।तकनीकी सत्रों में सूचित सहमति, आँकड़ों की सत्यनिष्ठा, लेखकत्व, साहित्यिक चोरी, हितों के टकराव, शोध में कदाचार तथा नियामक प्रावधानों के अनुपालन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। वास्तविक मामलों पर आधारित विचार-विमर्श के माध्यम से प्रतिभागियों ने व्यावहारिक नैतिक चुनौतियों पर चर्चा की। इसमें पूर्व में प्राप्त प्रश्नों को भी शामिल किया गया, जिससे प्रतिभागियों को अकादमिक और चिकित्सकीय शोध के दौरान सामने आने वाली समस्याओं पर विशेषज्ञों से संवाद करने का अवसर मिला।डॉ. संकल्प झा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यशाला की आयोजन समिति के अध्यक्ष बीएचयू के संकाय प्रमुख (शोध) प्रो. मनोज पांडेय थे। समिति के सह-अध्यक्षों में ईएनटी विभाग के प्रो. विश्वंभर सिंह, दंत चिकित्सा संकाय के प्रो. पी. जी. नवीन तथा विकृति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं सह-संकाय प्रमुख (शोध) प्रो. पी. एस. बायदगी शामिल थे।
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