उबैदुर्रहमान सिद्दीकी (इतिहासकार एवं साहित्यकार )
गाजीपुर। गंगा हिमगिरि की जटाशंकरी यह खेतीहर की महारानी
गंगा भक्तों की अभय देवता
यह तो जन जीवन का पानी
मनुष्य के जीवन के आरंभ से अंत तक अहम योगदान देने वाली गंगा नदी ना सिर्फ जीवन दायिनी है बल्कि जीवन की अंतिम क्षण भी लोग गंगा की गोद में बिताना चाहते हैं.
विशाल तट बचपन मे देखा था और अब धारा रोज़ सिकुड़ती जा रही है जो मेरी आँखों के सामने है. जैसा शास्त्रों मे है कि — एक दिन गंगा विलुत हो जाएगी और प्रलय आएगा.
इसे हम अपनी गंगा कहता हूं – गंगा से मुझे उतना ही प्यार है जितना एक आम नागरिक को होता है. बचपन से – इसकी गोद मे बैठा हूँ – तेरा हूँ – पानी मे गोता लगाया हूँ – अम्मा की अपनी सूती साड़ी से छोटी छोटी मछलियां पकड़ी है
ओ गंगा!
गंगा की है जवानी
इतरा रही है लहरे शरमा रहा है पानी
दोहराए जारही है हर मौज की रवानी
बीते हुए ज़माने की याद आती है
गुजरी हुई कहानी!
यह घाट जहाँ मै बैठा हूँ – सरकारी नक्शे और अभिलेखों मे मसूद घाट, मोहल्ला सैयदवाड़ा लिखा मिलता है.
गाज़ीपुर के संस्थापक अमीर मसूद के नाम पर – मसूद घाट से जाना जाता था – जैसा कि 1947 से पहले के जितने सरकारी गाज़ीपुर के मानचित्र हैं,मे है.
अब कोई मसूल घाट कोई मसूर घाट, कोई रामेश्वर घाट कहता है. इससे मुझे क्या मतलब हैं कि किस घाट पर हूं? मैं तो गंगा को निहारने आया हूं.
मुझे तो बस इस घाट से मतलब जहां आकर बैठता हूँ – एक आंनद मिलता है – सुख , शांति का एहसास होता है – तरह तरह के खूबसूरत एवं चंचल विचार पैदा होते है जिससे लिखने की गति मिलती हैं.
कोई चन्दन है रगड़ता
कोई करता है पाठ
जवानी यहां लहरों में समा जाती है
माहौल पे कुछ ताज़गी छा जाती है
यह सुबह गाज़ीपुर
यह लजाता सूरज
गंगा भी उजालों में नहा जाती है
याद वह भी मुझे दिन – जब 1975 से पहले गंगा के इस निर्मल पानी को – मै और मेरी बड़ी बहन मरियम अपनी अपनी लोहे की छोटी बाल्टी से भर के घर ले जाते थे – उससे खाना बनता था – बर्तन धोए जाते और बूढ़े दादा दादी इस गंगा के पानी से वज़ू बनाते थे – उस समय शहर मे पानी कम आता था.
बचपन मे यह हमारी गंगा थी – सबकी गंगा थी – हर बिरादरी – हर समाज के लोग अपनी गंगा समझते थे — अभी हिंदुस्तान – पाकिस्तान की तरह इस गंगा का बटवारा नहीं हुआ है।
यह मेरी गंगा – हर एक मुस्लमान की गंगा थी.
यह तेरी – मेरी गंगा नहीं थी – हम सब की थी।
यह हमारी गंगा इसीलिए तो मैं इसके तट को निहारने कभी कभी आता हूं – तन्हाई मे बैठकर कुछ खुद से बातें करता हूं।
कुछ देर आकर गंगा के पानी मे अपने पैर डालकर हिलोरे मारता हूँ – उठी हुई लहरों, मौजों से खेलता हूं – कभी उसकी कुछ बूंदे मेरे जिस्म पर पड़ जाती है जिसे मल लेता हूँ.
जब बिछी थी यह ज़मीं
तबसे है डेरा तेरा
ऋषियों मुनियों का तबस्सुम है सवेरा तेरा
सारे संसार में उड़ता है फरेरा
दिल को कर देता है पुर नूर अंधेरा तेरा
गूंज यहां अज़ान की है निशानी तेरी
पत्थरों पर है लिखी राम कहानी तेरी
अपने कंधो पे लिया बारे शिवाला तूने
मस्जिद व मीनार व महराब संभाला तूने
और मुहल्ले को दिया अपना उजाला तूने
अपनी संगत में मंदिर मस्जिद को ढाला तूने
अपने अंदाज से सब ने है सजाया तुझ को
धर्म व मजहब की पनाह गाह बनाया तुझ को
मेरा परण है – यहां तब तक आता रहूंगा, जब तक बूढा नं हो जाऊं.
क्यूंकि गंगा हम सभी के लिए एक वरदान है जो हमारे शहर के तट और उसके गालों को छू कर आगे बढ़ जाती है।
गंगा हम सभी गाज़ीपुर वालो की प्रियतम है। अपने प्रियतम से बेवफ़ाई कौन करेगा? कम से कम मै तो नहीं क्यूं कि यही हमारे शहर की एक पहचान है।
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