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मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर में साइबर सुरक्षा एवं डिजिटल फॉरेंसिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ

लखनऊ। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी), गोरखपुर के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग के अंतर्गत स्थापित साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर द्वारा साइंट टेक्नोलॉजीज, नई दिल्ली के सहयोग से साइबर सुरक्षा एवं डिजिटल फॉरेंसिक विषय पर छह सप्ताह का समर इंटर्नशिप प्रशिक्षण कार्यक्रम गुरुवार को एलन एम. ट्यूरिंग हॉल में भव्य रूप से प्रारंभ हुआ। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 11 जून से 21 जुलाई 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा, नेटवर्क सुरक्षा, डिजिटल साक्ष्य विश्लेषण तथा साइबर अपराध जांच के क्षेत्र में व्यावहारिक एवं शोधपरक ज्ञान प्रदान करना है। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि एवं माननीय कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में साइबर अपराधों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी, फिशिंग, सोशल मीडिया फ्रॉड, पहचान चोरी तथा साइबर ठगी जैसे मामलों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है।उन्होंने अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण वास्तविक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने न तो अपना OTP साझा किया और न ही अपने बैंक खाते की कोई गोपनीय जानकारी किसी को दी, फिर भी उसके खाते से धनराशि कट गई। जांच में यह सामने आया कि उस व्यक्ति के मोबाइल का उपयोग उसके बच्चे द्वारा ऑनलाइन गेम खेलने के लिए किया जा रहा था। इसी दौरान एक संदिग्ध मोबाइल एप्लिकेशन इंस्टॉल हो गई, जिसने अनधिकृत रूप से मोबाइल में उपलब्ध संवेदनशील जानकारी तक पहुंच प्राप्त कर ली, जिसके परिणामस्वरूप बैंक खाते से धन की निकासी हो गई।इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने सभी को सचेत करते हुए कहा कि केवल OTP साझा न करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनजान ऐप्स डाउनलोड करने से बचना, मोबाइल सुरक्षा सेटिंग्स को मजबूत रखना तथा बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखना भी अत्यंत आवश्यक है।उन्होंने आगे कहा कि विद्यार्थियों के कौशल विकास के लिए उद्योग-सहयोग आधारित प्रयोगशालाएं तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर में उपलब्ध अत्याधुनिक सुविधाओं का अधिकतम उपयोग करने तथा अर्जित ज्ञान का प्रयोग वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान, अनुसंधान एवं नवाचार में करने के लिए प्रेरित किया।विभागाध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि बढ़ते साइबर अपराध—जैसे डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन ठगी, साइबर स्टॉकिंग, सोशल मीडिया अपराध तथा पहचान चोरी—कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष गंभीर चुनौती बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि साइबर फॉरेंसिक्स डिजिटल साक्ष्यों के संग्रहण, विश्लेषण एवं न्यायालय में प्रस्तुतिकरण के माध्यम से अपराधियों की पहचान एवं अपराधों के सफल अन्वेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।उन्होंने यह भी बताया कि विभाग द्वारा 4.67 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित अत्याधुनिक “साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर” में मोबाइल फॉरेंसिक्स, डिस्क फॉरेंसिक्स, ड्रोन फॉरेंसिक्स तथा साइबर धोखाधड़ी जांच से संबंधित उन्नत सुविधाएं उपलब्ध हैं। यह केंद्र पहले से ही गोरखपुर पुलिस के विभिन्न थानों के साइबर अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु उपयोग में लाया जा रहा है तथा भविष्य में भी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम निरंतर संचालित किए जाते रहेंगे, जिससे विश्वविद्यालय एवं प्रशासन के बीच समन्वय और अधिक सुदृढ़ होगा।कार्यक्रम समन्वयक डॉ. विमल कुमार ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मोबाइल, कंप्यूटर एवं नेटवर्क फॉरेंसिक्स, मल्टीमीडिया विश्लेषण, ड्रोन एवं वीडियो फॉरेंसिक्स, वॉयस एनालिटिक्स, स्टेगनोग्राफी, पासवर्ड रिकवरी तथा साइबर जांच तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए प्रतिभागियों को मॉड्यूल-आधारित मूल्यांकन के साथ-साथ वास्तविक मामलों पर आधारित एक कैपस्टोन प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूर्ण करना होगा।साइंट टेक्नोलॉजीज, नई दिल्ली के विशेषज्ञ अनीकेत साहू ने कहा कि वर्तमान समय में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यावहारिक अनुभव भी उतना ही आवश्यक है। इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम उद्योग एवं शिक्षण संस्थानों के बीच की दूरी को कम करने तथा विद्यार्थियों को रोजगार एवं अनुसंधान के बेहतर अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली एवं ओडिशा सहित विभिन्न राज्यों से लगभग 58 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। कार्यक्रम में संकाय सदस्य, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। अंत में डॉ. बी. के. शर्मा ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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