शिवकुमार
गाजीपुर। मुहम्मदाबाद विधानसभा जनपद की सबसे हॉट सीट हैं। अंसारी बंधुओं की वजह से विधानसभा चुनाव में इस सीट की चर्चा देश-प्रदेश में चरम पर रहती है। 2027 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर बसपा ने भी इस बार कमर कस लिया है, इसलिए घोसी लोकसभा के पूर्व सांसद और कद्दावर नेता अतुल राय को इस बार विधानसभा चुनाव में उतारने की योजना बना रही है। अतुल राय के मुहम्मदाबाद विधानसभा से चुनाव लड़ने की खबर से जिले की सियासत गरमा गयी है। पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा भूमिहार मतदाता वाला विधानसभा सीट से कद्दावर भूमिहार नेता के उतरने से क्या अंसारी बंधुओं का वर्चस्व खत्म हो जायेगा। जिसकी चर्चा जिले के सियासी गलियारों में जोरों पर है। मुहम्मदाबाद विधानसभा में तीन लाख 85 हजार हजार मतदाता है। जिसमे करीब सवा लाख भूमिहार मतदाता है। इसके बाद दलित मतदाता है और इसी क्रम में यादव, कुशवाहा, मुसलमान और राजभर मतदाता आते हैं। अंसारी बंधुओं के जीत के संदर्भ में अतुल राय बताते हैं कि अंसारी बंधु मुहम्मदाबाद विधानसभा चुनाव में अपने विरोधियों के खिलाफ सामंतवाद के नारे और बाहुबल के बल पर हमेशा चुनाव जीतते आये हैं। मैं सामंतवाद के नारे और बाहुबल के तिलिस्म को विकास के बल पर तोड़ूंगा। उन्होने कहा कि अंसारी बंधु भूमिहार मतदाताओं के बिखराव से चुनाव नही जीतते हैं बल्कि बाहुबल और विरोधियों को सामंतवादी, गरीब-अमीर के नारों के बीच षड़यंत्र में फंसाकर चुनाव जीतते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा भी अपने बल पर कभी चुनाव नहीं जीती है। 2002 में बसपा प्रत्याशी वीरेंद्र राय का टिकट काटकर बबलू राय को टिकट दिया गया जिसके रिएक्शन में बबलू राय को बहुत कम वोट मिले और भाजपा प्रत्याशी कृष्णानंद राय चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने। 2005 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या हो गयी। 2006 के उपचुनाव में बीएसपी ने अपना प्रत्याशी नही खड़ा किया और अलका राय चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंच गयीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठबंधन में जनक कुशवाहा कांग्रेस के प्रत्याशी बनाये गये लेकिन वह बहुत ही कम मतों में सिमट कर रह गये और अलका राय दूसरी बार चुनाव जीत गयीं। इस तरह विपक्षी दल के अप्रत्यक्ष समर्थन से तीन बार भाजपा ने कमल का फूल खिलाया है। लेकिन बसपा का अभी तक मुहम्मदाबाद विधानसभा में खाता नही खुला है। आने वाले विधानसभा चुनाव में अब देखना है कि अतुल राय अपने पुरुषार्थ से अपने स्वजातीय बंधुओं का मत हाथी पर चढ़ा पाते हैं या नहीं।
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