मुहम्मद खालिद
गाजीपुर। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला पावन पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस वर्ष 4 सितंबर, शुक्रवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व को हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में माना जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन, झांकी, भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का श्रृंगार तथा मध्यरात्रि में जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में मथुरा के राजा कंस के अत्याचार से प्रजा त्रस्त थी। कंस ने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था। आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान कंस के अंत का कारण बनने वाली थी। इसी कारण कंस देवकी की संतानों से भयभीत रहता था। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में हुआ। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचार और अधर्म के अंत तथा धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया। उनके जन्म की खुशी में हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह धर्म, सत्य, न्याय और सदाचार की स्थापना का संदेश भी देती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्तव्य और धर्म के महत्व को समझाया। उन्होंने मनुष्य को फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा दी। इसी कारण जन्माष्टमी का पर्व लोगों को यह संदेश देता है कि जीवन में कठिन परिस्थितियां आने पर भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। जन्माष्टमी पर श्रद्धालु दिनभर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं और अनेक लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं। रात में मंदिरों और घरों में भजन-कीर्तन तथा भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार 2026 में जन्माष्टमी के अवसर पर निशीथ काल में पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान के बाल स्वरूप को पालने में विराजमान कर उनका श्रृंगार किया जाता है। जन्म के समय शंख-घंटे बजाकर श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का जयघोष करते हैं। इसके बाद आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी विभिन्न लीलाओं की झांकियां सजाई जाती हैं। इनमें कृष्ण जन्म, गोकुल आगमन, बाल कृष्ण की लीलाएं, गोवर्धन पर्वत धारण और रासलीला आदि प्रमुख हैं। बच्चे भी कृष्ण और राधा के रूप में सजकर कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन, धार्मिक प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री, फल, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की अनेक लीलाएं गोकुल और वृंदावन से जुड़ी मानी जाती हैं। नंद बाबा और माता यशोदा के घर पले-बढ़े बाल कृष्ण की माखन चोरी, गोप-गोपियों के साथ उनकी बाल लीलाएं और बांसुरी वादन की कथाएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय हैं। इसी कारण जन्माष्टमी पर विशेष रूप से बाल गोपाल की पूजा और झूला सजाने की परंपरा भी देखने को मिलती है। जन्माष्टमी के आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। मंदिरों में सामूहिक भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण के माध्यम से लोगों में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव और एकता की भावना भी मजबूत होती है। श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, करुणा, मित्रता, कर्तव्य और धर्म के प्रति समर्पण का संदेश देता है। इसलिए जन्माष्टमी का पर्व आज भी लोगों को अपने जीवन में अच्छे विचारों और सदाचार को अपनाने की प्रेरणा देता है। इस वर्ष 4 सितंबर को जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों और घरों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी और मध्यरात्रि में ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष के साथ जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
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