वाराणसी। “स्त्रियाँ समकालीन भारतीय ग्रामीण समाज में परिवर्तन की अगुवाई कर रहीं हैं। वे सभी प्रकार की सत्ताओं और उनके प्रतिबंधों के विरुद्ध प्रतिरोध कर रहीं हैं और ग्राम समाज में समानता की बुनियाद रख रहीं हैं।” ये बातें प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने दिनांक 3 सितंबर 2026 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र की ओर से आयोजित एक व्याख्यान में कहीं। ‘समकालीन भारत में ग्रामीण स्त्री’ विषय पर बात करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने कसाईबाड़ा, तिरिया चरित्तर, कुच्ची का कानून इत्यादि अपनी कहानियों के आधार पर ग्रामीण स्त्रियों के जीवन की परिस्थितियों को समझाया। उन्होंने बताया कि उनकी कहानियों की मुख्य प्रेरणा ग्रामीण स्त्रियाँ रहीं हैं इसलिए उनके कथा साहित्य में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बताया कि बदलते समय के साथ उनकी कहानियों के स्त्री पात्र भी बदलते रहे हैं। पात्रों में होने वाले परिवर्तन वास्तव में सामाजिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन है। अब स्त्रियाँ सामाजिक संघर्षों में और अधिक मुखर हुई हैं। प्रकृति स्त्रियों को संघर्ष की ताकत देती है। अनेक बार ‘फिक्शन से ज्यादा विस्मयकारी होता है सत्य’। सबसे ज्यादा वर्जना स्त्रियों पर ही लगाई जाती है और यह स्थिति आज भी बरकरार है। इसलिए संघर्ष तीव्र हो रहा है। शिवमूर्ति ने व्याख्यान के पश्चात श्रोताओं, विद्यार्थियों और शिक्षकों के प्रश्नों का भी जवाब दिया। इस संवाद में मंच सायोजन कर रहीं डॉ.प्रियंका सोनकर ने कहा कि शिवमूर्ति की कहानियों में ग्रामीण स्त्रियों का सशक्त रूप व्यक्त हुआ है। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मीनाक्षी झा ने किया। इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा स्त्री अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. आशीष त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम में प्रो. वशिष्ठ अनूप, प्रो. शशिकला त्रिपाठी, प्रो. डी.के ओझा, प्रो. प्रमोद बागड़े, प्रो. प्रवेश भारद्वाज, प्रो. प्रशांत ठाकुर, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. किंगसन सिंह पटेल, डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ. संपन्न चक्रवर्ती, डॉ. सत्य प्रकाश सिंह और डॉ. ज्योति सिंह आदि शिक्षक उपस्थित रहे।
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