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शरद पूर्णिमा और महिला स्वास्थ्य, एक मेडिकल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण- डॉ. संध्या यादव

​वाराणसी। डॉ. संध्या यादव वरिष्ठ प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ ने बताया कि आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को केवल एक धार्मिक पर्व मानना आधा सच है; मेडिकल साइंस की दृष्टि से यह ऋतु-संधि (Season Transition) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण काल है। स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में मेरा मानना है कि इस रात से जुड़े पारंपरिक रीति-रिवाज महिलाओं के बायोलॉजिकल क्लॉक (Biological Clock) और शारीरिक स्वास्थ्य से सीधे जुड़े हैं। ​हॉर्मोनल और न्यूरोलॉजिकल प्रभाव: शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है। इसकी किरणें और शांत वातावरण महिलाओं के पीसीओएस (PCOS), थायराइड और मासिक धर्म से जुड़ी अनियमितताओं को नियंत्रित करने वाले ‘पीनियल ग्रंथि’ (Pineal Gland) और मेलाटोनिन स्राव को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है। ​इम्यूनोलॉजी और क्रोनिक फटीग: वर्षा से शीत ऋतु में प्रवेश के दौरान महिलाओं में इम्युनिटी कमजोर होने से थकान और वायरल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ता है। खुले आसमान के नीचे टहलने से शुद्ध ऑक्सीजन और प्राकृतिक प्रकाश मिलता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। ​पोषण और बायोकेमिस्ट्री: खुले आसमान के नीचे रखी जाने वाली दूध-चावल की खीर में प्रयुक्त दूध, चावल और ड्राई फ्रूट्स कैल्शियम, ट्रिप्टोफैन और अमीनो एसिड का बेहतरीन स्रोत हैं। यह महिलाओं में अक्सर पाई जाने वाली कैल्सियम और विटामिन-डी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ गहरी नींद में मददगार है। ​डॉ. संध्या यादव की विशेष सलाह दिया कि 15-20 मिनट चाँदनी रात में जरूर टहलें, यह हॉर्मोनल बैलेंस के लिए बेहतरीन है। सात्विक खीर का सेवन करें (डायबिटीज व ओबेसिटी से ग्रसित महिलाएं चीनी के बजाय स्टीविया या कम मात्रा में मिश्री का प्रयोग करें)। ​स्वस्थ नारी से ही स्वस्थ समाज का निर्माण होता है।

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