मुहम्मद खालिद
गाजीपुर। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा का पर्व रविवार, 25 अक्टूबर को श्रद्धा और धार्मिक आस्था के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु मां लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात चंद्रमा की शीतल चांदनी का विशेष महत्व बताया गया है। इसी मान्यता के चलते घरों में दूध, चावल और चीनी से खीर तैयार की जाती है और उसे रात में चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। अगले दिन खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में वितरित किया जाता है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने और रात्रि जागरण करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। वहीं, ब्रज क्षेत्र में इस पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जोड़ा जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु स्नान-दान, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है तथा घरों में दीप प्रज्ज्वलित कर परिवार की मंगलकामना की जाती है। शरद पूर्णिमा का पर्व लोगों को आस्था, श्रद्धा और पारिवारिक एकता का संदेश देता है। पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि रविवार को सुबह 11 बजकर 55 मिनट से शुरू होकर सोमवार, 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी। धार्मिक परंपरा के अनुसार, रात्रि में चंद्रमा की पूजा और खीर रखने का विशेष महत्व है, जबकि सोमवार को स्नान-दान किया जाएगा।
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