लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधकर्ता पौधों से प्राप्त आवश्यक तेलों (Essential Oils) की मदद से नींबू को लंबे समय तक ताज़ा रखने और कटाई के बाद होने वाली बर्बादी को कम करने की संभावनाओं पर अध्ययन कर रहे हैं। इस संयुक्त शोध में लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. प्रदीप कुमार और जैव रसायन विभाग की डॉ. मधु कमले के साथ शोधार्थी चिकांशी शर्मा, रितुराज बोरा और पूर्णमश्री गोगोई ने भाग लिया। टीम ने नींबू में फफूंद के संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए पौधों से प्राप्त तेलों की प्रभावशीलता का अध्ययन किया। नींबू का उपयोग घरों, रेस्तरां और खाद्य उद्योगों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। हालांकि, भंडारण और परिवहन के दौरान इनमें हरे रंग की फफूंद लग सकती है। यह संक्रमण Penicillium digitatum नामक फफूंद के कारण होता है, जिससे फल खराब हो सकते हैं, उनका बाज़ार मूल्य घट सकता है और खाद्य पदार्थों की बर्बादी बढ़ सकती है। शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने का प्रयास किया कि क्या पौधों से प्राप्त आवश्यक तेल इस समस्या को कम कर सकते हैं। इन तेलों में प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं, जो फफूंद की वृद्धि को रोकने या धीमा करने में मदद कर सकते हैं।
लौंग और लेमनग्रास के तेल से मिले उत्साहजनक परिणाम
वर्ष 2026 में Journal of Food Processing and Preservation में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, प्रयोगशाला परीक्षणों में दोनों तेलों ने फफूंद की वृद्धि को रोकने में प्रभावी परिणाम दिखाए।
लौंग का आवश्यक तेल (Clove Essential Oil): फफूंद की वृद्धि में लगभग 89.81% की कमी दर्ज की गई।
लेमनग्रास का आवश्यक तेल (Lemongrass Essential Oil): फफूंद की वृद्धि में लगभग 76.69% की कमी दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं ने इसके बाद प्रयोगशाला में फफूंद के संपर्क में लाए गए नींबुओं पर भी इन तेलों का परीक्षण किया।
परीक्षण के 14 दिनों बाद, लौंग के आवश्यक तेल की 1,500 पीपीएम (ppm) सांद्रता और लेमनग्रास के आवश्यक तेल की 2,000 पीपीएम सांद्रता से उपचारित नींबुओं में कोई दिखाई देने वाला सड़न का लक्षण नहीं मिला।
किसानों और खाद्य उद्योग को क्या हो सकता है लाभ?
इस शोध से संकेत मिलता है कि लौंग और लेमनग्रास जैसे पौधों से प्राप्त तेल भविष्य में नींबू को फफूंद से बचाने का एक प्राकृतिक विकल्प बन सकते हैं। यदि व्यावसायिक भंडारण और परिवहन की परिस्थितियों में भी इनके प्रभाव की पुष्टि होती है, तो इनके उपयोग से कई संभावित लाभ मिल सकते हैं:
कटाई के बाद फलों की बर्बादी कम करने में मदद।
नींबू की गुणवत्ता और बाज़ार मूल्य बनाए रखने की संभावना।
भंडारण के दौरान फफूंद से होने वाले नुकसान को कम करना।
अधिक टिकाऊ और प्रकृति-आधारित खाद्य संरक्षण तकनीकों के विकास को बढ़ावा देना। हालांकि, अभी इन परिणामों को सीधे व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार समाधान नहीं माना जा सकता। बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले उपचार की सुरक्षा, नींबू के स्वाद और गुणवत्ता पर प्रभाव, लागत तथा वास्तविक भंडारण परिस्थितियों में इसकी प्रभावशीलता का आकलन करना आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
लखनऊ विश्वविद्यालय का यह शोध वनस्पति विज्ञान, जैव रसायन और अनुप्रयुक्त सूक्ष्मजीव विज्ञान के संयुक्त प्रयास का उदाहरण है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि प्राकृतिक आवश्यक तेल भविष्य में नींबू के खराब होने की समस्या से निपटने में उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, इस तकनीक को किसानों और खाद्य उद्योग तक पहुंचाने से पहले और अधिक व्यावहारिक परीक्षणों की आवश्यकता है।
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