लखनऊ। डिजिटल क्रांति के इस युग में उच्च शिक्षण संस्थानों और अकादमिक जगत के सामने ‘इन्फोक्सिकेशन’ (Infoxication – सूचना का अतिप्रवाह एवं बौद्धिक भटकाव) एक गंभीर मनोवैज्ञानिक व अकादमिक चुनौती बनकर उभरा है। इस ज्वलंत विषय पर लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्र विभाग की सीनियर रिसर्च फेलो प्रियंका जोशी तथा शिक्षा शास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. दिनेश कुमार द्वारा संयुक्त रूप से लिखा गया शोध पत्र ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज’ (AIU) के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय जर्नल ‘यूनिवर्सिटी न्यूज’ में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है।
क्या है ‘इन्फोक्सिकेशन‘ और क्यों बढ़ रही है समस्या:
शोध के अनुसार, ‘इन्फोक्सिकेशन’ शब्द ‘इन्फॉर्मेशन’ (Information) और ‘इंटॉक्सीकेशन’ (Intoxication) के मेल से बना है। यह उस संज्ञानात्मक अधिभार (Cognitive Overload) की स्थिति को दर्शाता है, जहाँ अत्यधिक, बिखरी हुई और दोहराव भरी सूचनाओं के कारण व्यक्ति सोचने, समझने, प्राथमिकताएं तय करने और सही निर्णय लेने में स्वयं को असमर्थ महसूस करता है। अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि वैश्विक स्तर पर प्रतिदिन लगभग 2.5 क्विंटिलियन बाइट्स डेटा उत्पन्न हो रहा है। वहीं, अकादमिक क्षेत्र में प्रतिवर्ष 30 लाख (3 मिलियन) से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो रहे हैं और वैश्विक अकादमिक डेटा प्रत्येक 15 वर्षों में दोगुना हो रहा है। शोधकर्ताओं पर लगातार बने रहने वाले ‘पब्लिश ऑर पेरिश’ (Publish or Perish) के दबाव ने गहराई के स्थान पर केवल संख्यात्मक उत्पादन को बढ़ावा दिया है, जिससे सूचना का अंबार लग गया है।
विद्यार्थियों और शिक्षकों पर नकारात्मक प्रभाव:
शोध पत्र में इन्फोक्सिकेशन के बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण किया गया है:
* *छात्रों पर प्रभाव:* अत्यधिक ऑनलाइन सामग्री, वेबिनार, मूक (MOOCs) और डिजिटल अलर्ट्स के कारण विद्यार्थियों में एकाग्रता की कमी, तनाव, चिंता और ‘फोमो’ (Fear of Missing Out) बढ़ रहा है। वे प्रामाणिक व भ्रामक सूचनाओं में अंतर करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, जिससे उनकी आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) कमजोर हो रही है।
* *शिक्षकों व शोधकर्ताओं पर प्रभाव:* अनगिनत स्रोतों की छंटनी और अद्यतन रहने के निरंतर दबाव से शिक्षकों में ‘कॉग्निटिव फटीग’ (बौद्धिक थकान) और बर्नआउट की समस्या बढ़ रही है, जिससे मौलिक शोध की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
* *संस्थागत चुनौतियां:* पुस्तकालय तंत्र पर दबाव, पाठ्यक्रम निर्माण में जटिलता और डिजिटल असमानता जैसी संस्थागत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।
प्रबंधन एवं समाधान के प्रमुख उपाय:
शोधकर्ताओं ने इस चुनौती से निपटने के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर दोहरी रणनीति अपनाने का सुझाव दिया है:
- *डिजिटल साक्षरता एवं न्यूनतमवाद (Digital Minimalism):* सूचनाओं के अंधाधुंध उपभोग से बचकर आवश्यक और विश्वसनीय स्रोतों पर ही ध्यान केंद्रित करना।
- *समय प्रबंधन तकनीक:* कार्य के दौरान 25-25 मिनट के अंतराल में काम करने जैसी ‘पोमोडोरो तकनीक’ (Pomodoro Technique) अपनाना तथा नियमित अंतराल पर मानसिक स्वास्थ्य हेतु विराम लेना।
- *तकनीकी टूल्स का विवेकपूर्ण उपयोग:* संदर्भ प्रबंधन हेतु ‘जोटेरो’ (Zotero) व ‘मेंडेली’ (Mendeley) जैसे टूल्स तथा सार संक्षेपण के लिए एआई (AI) एवं वेब 3.0 तकनीकों का उपयोग करना, ताकि तकनीकी दक्षता और मानवीय मौलिकता में संतुलन बना रहे।
- *सांस्कृतिक बदलाव:* विश्वविद्यालयों और नियामक निकायों को केवल प्रकाशनों की संख्या गिनने के बजाय शोध की गहराई व गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले मूल्यांकन मॉडल अपनाने चाहिए।
शोधकर्ताओं का मानना है कि डिजिटल युग में उच्च शिक्षा की सार्थकता सूचनाओं का अंबार लगाने में नहीं, बल्कि विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए उन्हें सार्थक, गहन व मूल्यवान ज्ञान से जोड़ने में निहित है।

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