लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के शोध एवं अकादमिक जगत में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (Council of Science & Technology, U.P. – CSTUP) द्वारा विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग (Department of Zoology) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तृप्ति यादव के एक अभिनव शोध प्रोजेक्ट को औपचारिक स्वीकृति प्रदान करते हुए वित्तीय सहायता स्वीकृत की गई है।
परियोजना का विषय एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
डॉ. तृप्ति यादव द्वारा प्रस्तुत इस अनुमोदित शोध परियोजना का शीर्षक “Biological Control Beyond Predation: Non-Consumptive Effects of Ladybird Beetles on Aphids” है। यह शोध मुख्य रूप से फसलों को व्यापक नुकसान पहुँचाने वाले हानिकारक एफिड्स (माहू कीट) पर लेडीबर्ड बीटल (लेडीबर्ड भृंग) के गैर-उपभोग्य प्रभावों (Non-Consumptive Effects) के वैज्ञानिक अध्ययन पर केंद्रित है। सामान्यतः लेडीबर्ड कीटों को एफिड्स के प्राकृतिक शिकारी के रूप में देखा जाता है, परंतु यह परियोजना इस पारंपरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर यह पता लगाएगी कि लेडीबर्ड की मात्र उपस्थिति, गंध और व्यवहारात्मक दबाव किस प्रकार एफिड्स की प्रजनन क्षमता, भोजन की आदतों और उनकी आबादी को नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
समाज, किसान और पर्यावरण से सीधा जुड़ाव (Social Connect):
यह वैज्ञानिक शोध प्रयोगशाला की दीवारों से निकलकर सीधे हमारे खेतों, किसानों की आर्थिक स्थिति और आम जनमानस के स्वास्थ्य से जुड़ा है:
- रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग पर लगाम: वर्तमान में किसान फसलों को एफिड्स (माहू) से बचाने के लिए भारी मात्रा में जहरीले रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। यह शोध प्राकृतिक जैविक नियंत्रण की ऐसी समझ विकसित करेगा, जिससे कीटनाशकों पर किसानों की निर्भरता कम होगी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना फसलों की रक्षा हो सकेगी।
- किसानों की लागत में कमी और आर्थिक संबल: कीटनाशकों की लगातार बढ़ती कीमतें छोटे और सीमांत किसानों की कृषि लागत को अत्यधिक बढ़ा देती हैं। लेडीबर्ड बीटल के व्यवहार और पारिस्थितिक प्रभाव पर आधारित यह प्राकृतिक समाधान खेती की लागत घटाकर किसानों की शुद्ध आय बढ़ाने में मददगार सिद्ध होगा।
- सुरक्षित खाद्यान्न और जन-स्वास्थ्य की सुरक्षा: सब्जियों और दलहनी फसलों पर छिड़के जाने वाले जहरीले रसायनों के अंश भोजन के माध्यम से मानव शरीर में पहुंचकर कैंसर, पेट के विकार और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का कारण बनते हैं। जैविक कीट प्रबंधन को बढ़ावा मिलने से आम नागरिकों को विषमुक्त व स्वास्थ्यवर्धक कृषि उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।
- मित्र कीटों व जैव-विविधता का संरक्षण: रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से खेतों में मौजूद मधुमक्खियों और अन्य मित्र कीटों की आबादी नष्ट हो रही है। यह प्राकृतिक जैविक अध्ययन कृषि पारिस्थितिकी तंत्र (Agro-ecosystem) के संतुलन और जैव-विविधता को पुनर्स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह अनुसंधान न केवल कीट विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान के नए द्वार खोलेगा, बल्कि राज्य में सतत कृषि, पर्यावरण संतुलन और हरित भविष्य के निर्माण में एक युगांतकारी योगदान देगा।
Purvanchal News जोड़े आपको पूर्वांचल से….