वाराणसी। दीपोत्सव का पावन पर्व अपने साथ उल्लास की जो लहर लेकर आता है, उसका श्रीगणेश ‘धनतेरस’ से होता है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी का यह दिवस मात्र भौतिक वस्तुओं की खरीदी का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में आरोग्य, संयम और सकारात्मकता के स्वागत का स्वर्णिम अवसर है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के उपरांत आज ही के दिन आयुर्वेद के अधिष्ठाता भगवान धन्वन्तरि हाथों में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे। यही कारण है कि यह पावन बेला ‘धन्वन्तरि जयंती’ के रूप में भी पूजित है। जिस प्रकार वे ब्रह्मांड के लिए संजीवनी लेकर आए थे, वह हमें यह चिर-सत्य स्मरण कराता है कि “पहला सुख निरोगी काया” है। एक चिकित्सक के रूप में मेरा अनुभव यह है कि आधुनिक युग की इस अंधी दौड़ ने हमारी जीवनशैली को अव्यवस्थित कर दिया है। विशेष तौर पर एक नारी और जननी का स्वस्थ होना संपूर्ण परिवार की धुरी है; घर की नींव यदि आरोग्यता से परिपूर्ण हो, तो पूरा कुनबा ऊर्जावान रहता है। धनतेरस का वास्तविक मर्म यही है कि समृद्धि का आनंद तभी है जब देह स्वस्थ हो। आयुर्वेद के शाश्वत सिद्धांतों, योग और सहज दिनचर्या को अपनाकर ही हम दीर्घायु का वरदान पा सकते हैं। इस धनतेरस आइए केवल धातु या आभूषण खरीदने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन में उत्तम स्वास्थ्य और सद्विचारों के रोपण का संकल्प लें। याद रखिए, निरोगी शरीर ही सबसे बड़ा धन है। भगवान धन्वन्तरि से प्रार्थना है कि वे हर घर को आरोग्यता और अनंत समृद्धि से अभिसिंचित करें।
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