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एमएमएमयूटी के शोधकर्ताओं को सौर ऊर्जा आधारित स्मार्ट तकनीक का पेटेंट, अब मछली पालक घर बैठे जान सकेंगे तालाब के पानी की गुणवत्ता

लखनऊ। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर के शोधकर्ताओं ने मत्स्य पालन को अधिक वैज्ञानिक और सुविधाजनक बनाने वाली तकनीक विकसित कर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं को ‘सोलर-पावर्ड एक्वाकल्चर मॉनिटरिंग सिस्टम यूजिंग आईओटी’ नामक नवाचार के लिए पेटेंट प्राप्त हुआ है। सौर ऊर्जा और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) पर आधारित इस तकनीक की सहायता से मछली पालक अपने तालाब के पानी की गुणवत्ता की जानकारी घर बैठे प्राप्त कर सकेंगे। इस प्रणाली की विशेषता यह है कि मछली पालकों को पानी की स्थिति जानने के लिए बार-बार तालाब पर जाकर जांच करने की आवश्यकता कम होगी। तालाब में लगाए गए विशेष सेंसर पानी में घुली ऑक्सीजन (डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन), तापमान, पीएच और टर्बिडिटी अर्थात पानी के मटमैलेपन की लगातार निगरानी करेंगे। ये सभी मानक मछलियों के स्वस्थ विकास और जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस तकनीक में सेंसर से प्राप्त आंकड़े आईओटी के माध्यम से क्लाउड प्लेटफॉर्म पर भेजे जाते हैं। इससे मछली पालक इंटरनेट की सहायता से कहीं से भी अपने तालाब के पानी की स्थिति देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि तालाब में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगे या पानी की गुणवत्ता बिगड़ने लगे, तो उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसान समय रहते आवश्यक उपाय कर सकेंगे। इससे मछलियों के बीमार होने या मरने का जोखिम कम करने, उत्पादन बढ़ाने और मत्स्य पालकों की आय में सुधार की संभावना है। विशेष रूप से छोटे और ग्रामीण मछली पालकों के लिए यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि पानी की गुणवत्ता में होने वाले बदलावों की समय पर जानकारी मिलने से संभावित नुकसान को कम किया जा सकेगा। इस नवाचार की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता सौर ऊर्जा का उपयोग है। प्रणाली के संचालन के लिए सोलर पावर का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह उन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकती है, जहां बिजली की आपूर्ति नियमित नहीं रहती। इससे पारंपरिक मत्स्य पालन को आधुनिक डिजिटल तकनीक से जोड़ने के साथ ऊर्जा के टिकाऊ उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा। इस पेटेंट के नवाचारकर्ताओं में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के शोधार्थी अंकित कुमार, सहायक प्राध्यापक डॉ. अनुपम साहू तथा प्रो. संजय कुमार सोनी शामिल हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक मछली पालकों को अनुमान के बजाय वास्तविक आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने में सहायता प्रदान कर सकती है। भविष्य में इसके और विकास तथा व्यावहारिक उपयोग से तालाबों के बेहतर प्रबंधन, संसाधनों के प्रभावी इस्तेमाल और मत्स्य उत्पादन को अधिक लाभकारी बनाने में मदद मिल सकती है। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने शोधकर्ताओं को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा, “यह पेटेंट वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए नवाचारपरक अनुसंधान को बढ़ावा देने की एमएमएमयूटी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मत्स्य पालन में सौर ऊर्जा और आईओटी तकनीक का उपयोग एक सराहनीय पहल है, जिससे मछली पालकों को लाभ मिलने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के सतत विकास को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।”

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