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भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार- प्रो. बलराम शुक्ल

लखनऊ। भारत राजनीतिक रूप से औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो चुका है, लेकिन मानसिक रूप से आज भी हम स्वयं को औपनिवेशिक मानदंडों पर परखते हैं। इस मानसिक दासता से मुक्ति और भारतीय मूल्यों के आधार पर अपनी पहचान विकसित करना भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमुख उद्देश्य है। ये बातें दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. बलराम शुक्ल ने शुक्रवार को मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर में आयोजित विशेष व्याख्यान में कहीं। विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग की ओर से कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा के संरक्षण में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का स्वरूप एवं विस्तार’ विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। प्रो. शुक्ल ने भारतीय ज्ञान परंपरा की तीन प्रमुख विशेषताएं प्राचीनता, अविच्छिन्नता और विपुलता बताईं। उन्होंने कहा कि प्राचीनता के कारण इसकी जड़ें गहरी हैं, जो बाहरी प्रभावों का प्रतिरोध करने की शक्ति देती हैं। अविच्छिन्नता इसकी हजारों वर्षों की निरंतरता का प्रमाण है, जबकि विपुलता दूसरी परंपराओं से ज्ञान ग्रहण करने और निरंतर विकसित होने की उदारता को दर्शाती है। प्रो. शुक्ल ने कहा कि भारत को उपनिवेश बनाने वाली सभ्यताएं सेमियोटिक विचारधारा से प्रभावित थीं, जबकि भारत विभिन्न परंपराओं की नर्सरी रहा है। दुनिया की अनेक परंपराएं अपने मूल स्थानों से समाप्त हो गईं, लेकिन भारत में आईं परंपराएं आज भी किसी न किसी रूप में जीवित हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो भारत में दाखिल हुआ, वह खारिज नहीं हुआ। भारतीय परंपरा की विशेषता दूसरे विचारों को नकारना नहीं, बल्कि उनके साथ सहजीविता और समन्वय स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि सामान्यतः परंपरा को जड़ और स्थिर माना जाता है, लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा निरंतर विकासमान रही है। भारतीय चिंतन में परंपरा और आधुनिकता तथा लोक और शास्त्र परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। आधुनिकता को परंपरा का ही स्वाभाविक पुष्पन-पल्लवन माना गया है। यहां शास्त्र जीवन के साथ विकसित होते हैं और प्राचीन ज्ञान बदलती परिस्थितियों के अनुसार नया स्वरूप ग्रहण करता है। प्रो. शुक्ल ने कहा कि औपनिवेशिक शासन ने भारतीय चिंतन को बदलने का प्रयास किया, लेकिन इसकी प्राचीनता और निरंतरता ने इसे जीवित रखा। भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार है। यह अपने भीतर उत्पन्न विकृतियों को पहचानती है और उन्हें दूर करने की क्षमता भी स्वयं विकसित करती है। अध्यक्षीय संबोधन में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. एसएन सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति और संस्कृति के सामंजस्य पर आधारित है। यही सामंजस्य इसकी निरंतरता और स्थायित्व का आधार है। इससे पूर्व भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग के अध्यक्ष डॉ. मिलिंद राज आनंद ने मुख्य वक्ता को पौधा भेंट कर स्वागत किया। व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों ने प्रश्न पूछे, जिनका प्रो. शुक्ल ने उत्तर दिया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. एसएन सिंह और डॉ. मिलिंद राज आनंद ने मुख्य वक्ता को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. गरिमा यादव ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मिलिंद राज आनंद ने किया। इस अवसर पर डॉ. अभिजित मिश्र, डॉ. अमलेश यादव, डॉ. मंतशा अजीज, डॉ. सुषमा पांडेय, डॉ. नीतू राजपूत, तान्या श्रीवास्तव सहित विभाग के शोधार्थी और लगभग 150 विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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