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काशी नरेश के महाराजा पैलेस में हुई थी सबसे पहले दुर्गा पूजा

ग़ाज़ीपुर ।काशी की धरती पर सार्वजनिक दुर्गोत्सव की शुरुआत वर्ष 1922 में वाराणसी दुर्गोत्सव सम्मिलनी (वीडीएस) के गठन के साथ हुई थी। इस संस्था ने पहली दुर्गापूजा काशी नरेश के नदेसर स्थित महाराजा पैलेस परिसर में आयोजित की थी। इस ऐतिहासिक अवसर पर काशी का राजपरिवार भी सम्मिलित हुआ था। कुछ ही वर्षों बाद पूजा स्थल को पांडेय हवेली स्थित सीएम एंग्लो बंगाली प्राइमरी पाठशाला प्रांगण  में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से यह परंपरा आज तक निरंतर चल रही है।संस्था के गठन के बाद लगभग 50 वर्षों तक पूर्वांचल के कई प्रतिष्ठित बंगीय परिवार इस पूजा से जुड़े रहे। स्वर्ण जयंती वर्ष में संस्था के अध्यक्ष ध्रुवज्योति मुखर्जी और सचिव पूर्णेंदु भट्टाचार्य थे, जबकि हीरक जयंती वर्ष के समय पूर्णंदु भट्टाचार्य और देवाशीष दास सचिव रहे। संस्था की यात्रा के दौरान लगभग 55 वर्ष बाद पहला बड़ा विघटन हुआ, जब कुछ सदस्यों ने अलग होकर काशी दुर्गोत्सव समिति (केडीएस) की स्थापना निर्मलकांति चक्रवर्ती के नेतृत्व में की। इसके दो वर्ष बाद डॉ. दिनेश सेन के नेतृत्व में शारदोत्सव संघ का गठन भी हुआ।संजीव विश्वास के अनुसार, इस पूजा पंडाल की सबसे खास परंपरा यह है कि यहां हमेशा एक ही चाल की प्रतिमा स्थापित की जाती है। प्रतिमा के आकार या स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाता। स्थापना से ही प्रतिमा को पंडाल तक कंधे पर लाया जाता है और विसर्जन के समय भी कंधे पर ही विदा किया जाता है। पंडाल का एक और आकर्षण शैक्षणिक प्रतियोगिताएं रही हैं। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद संस्था ने इन्हें कभी बंद नहीं किया। लगभग 15 वर्ष पहले तक यहां शास्त्रीय संगीत के विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनसे पंडाल की सांस्कृतिक पहचान और गहरी हो गई थी।काशी की इस पहली सार्वजनिक दुर्गापूजा ने न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता को भी नई दिशा दी। आज जब इस परंपरा को 103 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तो यह नवरात्रि पर्व में श्रद्धा, भक्ति और लोक-संस्कृति का अद्वितीय संगम बनकर पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।

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