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बीएचयू ने शुरू किया राजघाट उत्खनन में प्राप्त मानव कंकाल का ऐतिहासिक जेनेटिक अध्ययन

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने एक ऐसे महत्त्वपूर्ण अध्ययन की शुरुआत की है, जिससे काशी और गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की आनुवंशिक पहचान और जीवन-शैली से जुड़े अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होने की संभावना है। इस अध्ययन के माध्यम से सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल राखीगढ़ी से प्राप्त मानव अवशेषों के साथ इनकी समानताओं और भिन्नताओं की भी जाँच की जाएगी। यह विस्तृत आनुवंशिक और जैव-पुरातात्त्विक अध्ययन कला संकाय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में संरक्षित एक खंडित मानव कंकाल पर किया जा रहा है। यह कंकाल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा मध्य गंगा घाटी के प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था।गंगा और वरुणा नदियों के संगम के निकट, वाराणसी के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित राजघाट की पहचान वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार कार्य के दौरान हुई थी। इसके बाद भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा यहाँ व्यापक उत्खनन कार्य किया गया। विशेष रूप से वर्ष 1957 से 1969 के बीच प्रो. ए. के. नारायण और टी. एन. राय के नेतृत्व में हुए उत्खननों से विभिन्न सांस्कृतिक कालखंडों से जुड़े अवशेष प्राप्त हुए। इनमें आवासीय संरचनाएँ, टेराकोटा कलाकृतियाँ, मुहरें और अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेष शामिल हैं। अध्ययन के लिए चयनित कंकाल भी इन्हीं उत्खननों के दौरान प्राप्त हुआ था, जिस पर अब विज्ञान संस्थान के जन्तु विज्ञान विभाग तथा कला संकाय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा संयुक्त अनुसंधान किया जा रहा है। अब तक इस कंकाल का कोई वैज्ञानिक जैविक विश्लेषण नहीं किया गया था और न ही इसकी सटीक कालावधि निर्धारित की जा सकी थी। मंगलवार को प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह ने अत्यंत सावधानी के साथ कंकाल के नमूने एकत्र किए। इस दौरान प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की प्रो. सुजाता गौतम, डॉ. सचिन तिवारी और डॉ. जोस टॉम राफेल भी उपस्थित रहे।प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एम. पी. अहिरवार ने कहा कि राजघाट, काशी की प्राचीनता और उसकी निरंतरता का एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है। उन्होंने बताया कि इस कंकाल का संरक्षण विभाग की एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी रही है। उन्होंने कहा, “आधुनिक वैज्ञानिक विधियों की सहायता से अब हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि गंगा घाटी के प्राचीन निवासी कौन थे, उनकी जीवन-शैली कैसी थी और उनकी आनुवंशिक पहचान क्या थी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के जन्तु विज्ञान विभाग की ज्ञान प्रयोगशाला के साथ किया जा रहा यह सहयोग पुरातत्त्व और विज्ञान के बीच की दूरी को कम करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।” उन्होंने यह भी बताया कि विभाग की ओर से इस कंकाल के आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन के लिए एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था।यह अध्ययन प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, जन्तु विज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सहयोग से किया जा रहा है। प्रो. चौबे ने बताया कि यह अध्ययन गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक विविधता को समझने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा, “प्राचीन डीएनए विश्लेषण के माध्यम से हम इनकी वंशावली का पता लगाएंगे, जबकि आइसोटोप विश्लेषण से आहार तथा जीवनशैली की जानकारी प्राप्त करेंगे। विशेष रूप से यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा कि राजघाट का यह व्यक्ति राखीगढ़ी (हड़प्पा काल) के कंकालों से आनुवंशिक रूप से कितना मिलता-जुलता है या कितना भिन्न है। इससे सिंधु घाटी और गंगा घाटी की आबादियों के बीच डीएनए संबंधों का नया खुलासा हो सकता है।”नई जानकारी प्राप्त करने व ज्ञान सृजन हेतु दोनों विभागों के इस संयुक्त प्रयास की सराहना करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ऐसे कार्यों के लिए आदर्श संस्थान है, क्योंकि यहां अंतर्विषयक अध्ययन व अनुसंधान के लिए समृद्ध व विविधतापूर्ण वातावरण उपलब्ध है। ऐसे कार्य महत्वाकांक्षी बहु-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने के साथ साथ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को इस क्षेत्र में एक अग्रणी एवं पसंदीदा स्थान के रूप में स्थापित करते हैं। कुलपति जी ने आशा व्यक्त की कि राजघाट कंकाल पर किया जाने वाला यह अध्ययन न सिर्फ पुरातत्व, इतिहास और जेनेटिक्स के बीच एक सार्थक सेतु स्थापित करेगा, बल्कि भारत की प्राचीन विरासत के बारे में वैज्ञानिक समझ को समृद्ध करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। अध्ययन के दौरान मुख्य रूप से तीन प्रमुख वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाएंगे; प्राचीन डीएनए विश्लेषण द्वारा व्यक्ति की आनुवंशिक वंशावली, जनसंख्या संबंध और राखीगढ़ी सहित अन्य प्राचीन दक्षिण एशियाई नमूनों से तुलना की जाएगी; स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण आहार की आदतें, भोजन स्रोत और संभावित भौगोलिक गतिशीलता की जानकारी देगा और जैव-पुरातात्विक एवं काल निर्धारण अध्ययन कंकाल की आयु, स्वास्थ्य स्थिति तथा रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से सटीक तिथि का निर्धारण देगा।

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