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एस्पिरिन बनाने की पर्यावरण-अनुकूल विधि पर एमएमएमयूटी को मिला पेटेंट

लखनऊ। भौतिकी एवं पदार्थ विज्ञान विभाग, मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर के शोधकर्ताओं को एस्पिरिन के निर्माण की पर्यावरण-अनुकूल विधि विकसित करने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने विश्वविद्यालय को “इंटीग्रेटेड बायोकैटेलिटिक मेथड फॉर एसिटाइलसैलिसिलिक एसिड (एस्पिरिन) प्रोडक्शन यूजिंग पपेन” नामक आविष्कार के लिए पेटेंट प्रदान किया है। इस शोध में पपेन (Papain) का उपयोग बायोकैटेलिस्ट (Biocatalyst) के रूप में कर एस्पिरिन के संश्लेषण की विधि विकसित की गई है। इसके आविष्कारकों में प्रो. बृजेश कुमार पांडेय प्रथम आविष्कारक तथा शोधार्थी सौरव मिश्रा द्वितीय आविष्कारक हैं। पेटेंट एमएमएमयूटी के नाम से प्रदान किया गया है। प्रो. बृजेश कुमार पांडेय के निर्देशन में किए गए इस शोध में ग्रीन केमिस्ट्री (Green Chemistry) और बायोकैटेलिसिस (Biocatalysis) के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए एस्पिरिन बनाने की वैकल्पिक प्रक्रिया पर काम किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार इसका उद्देश्य दवाओं के निर्माण में अधिक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ प्रक्रियाओं की संभावनाओं को आगे बढ़ाना है। सरल शब्दों में कहें तो इस पेटेंट का महत्व केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। एस्पिरिन एक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला औषधीय यौगिक है। यदि भविष्य में इस तकनीक को बड़े पैमाने पर दवा निर्माण के लिए सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है, तो यह दवाओं के निर्माण की प्रक्रिया को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में उपयोगी हो सकती है। ग्रीन केमिस्ट्री और बायोकैटेलिसिस आधारित प्रक्रियाओं का उद्देश्य सामान्यतः हानिकारक पदार्थों और रासायनिक कचरे को कम करना तथा निर्माण प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना होता है। इसलिए लंबे समय में ऐसी तकनीक का लाभ स्वच्छ उत्पादन, कम पर्यावरणीय बोझ और अधिक टिकाऊ फार्मास्युटिकल उद्योग के रूप में आम लोगों तक पहुंच सकता है। हालांकि, इस पेटेंट से एस्पिरिन की कीमत में कितनी कमी आएगी या इसका व्यावसायिक उत्पादन कितना सस्ता होगा, यह बड़े स्तर पर परीक्षण और व्यावसायीकरण के बाद ही स्पष्ट होगा। प्रयागराज के नैनी निवासी सौरव मिश्रा वर्तमान में एमएमएमयूटी में भौतिकी विषय में पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने इस उपलब्धि को अपनी दादी कुसुम देवी को समर्पित किया है। उन्होंने अपनी माता नीतू मिश्रा, भाइयों शैलेन्द्र मिश्रा, शांतनु मिश्रा एवं प्रशांत पांडेय तथा बहन अवंतिका मिश्रा के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपने शोध निर्देशक प्रो. बृजेश कुमार पांडेय, शोध सहयोगियों और विश्वविद्यालय को भी सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। शोधकर्ताओं के अनुसार, पेटेंट मिलने से इस शोध को बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) के रूप में औपचारिक मान्यता मिली है। यह उपलब्धि ग्रीन और सस्टेनेबल फार्मास्युटिकल सिंथेसिस के क्षेत्र में आगे के शोध के लिए भी उपयोगी आधार बन सकती है। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने इस उपलब्धि पर प्रो. बृजेश कुमार पांडेय और शोधार्थी सौरव मिश्रा को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों पर केंद्रित इस प्रकार के शोध वर्तमान समय की आवश्यकता हैं। कुलपति ने दोनों आविष्कारकों को इस शोध को आगे बढ़ाने और इसके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं पर कार्य करने के लिए शुभकामनाएं दीं।

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