(मुहम्मद खालिद)
गाजीपुर। दीपावली पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। सनातन धर्म में धनतेरस का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व धन, वैभव, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और यमराज की पूजा-अर्चना करने की परंपरा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इसलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहती है। धनतेरस पर सोना, चांदी, पीतल, तांबा और अन्य धातुओं के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। इसके अलावा झाड़ू, नए घरेलू सामान और जरूरत की वस्तुओं की खरीदारी भी की जाती है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में शुभता और समृद्धि लेकर आती हैं। हालांकि इस पर्व का वास्तविक संदेश केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि धन के सदुपयोग, स्वास्थ्य की रक्षा और परिवार में खुशियां बांटने से भी जुड़ा है। इस दिन घरों की साफ-सफाई कर मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जाती है तथा शाम को दीप जलाकर भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। यमदीपदान की भी विशेष परंपरा है। मान्यता के अनुसार, घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। धनतेरस का पर्व हमें यह संदेश देता है कि जीवन में धन के साथ-साथ स्वास्थ्य, सदाचार, परिश्रम और संतोष का भी विशेष महत्व है। सच्ची समृद्धि वही है, जहां परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारों से परिपूर्ण हो।
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