मऊ। महाराष्ट्र के नासिक स्थित शक्तिपीठ भद्रकाली का प्रांगण काशी के वैदिक विद्वानों के मंत्रोचारण व मऊ के श्रद्धालुओं के स्वाहकार से गूंज उठा। जनपद के लगभग तीन दर्जन से अधिक परिवारों द्वारा सामूहिक रूप से मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों पर शतचंडी महायज्ञ अनुष्ठान का आयोजन किया गया। इस अनुष्ठान के पिछले 17 वर्षों से चले आ रहे अनुष्ठान के क्रम में इस वर्ष 18वें वर्ष महाराष्ट्र के नासिक स्थित माता भद्रकाली व सप्तश्रृंगी के स्थान पर अनुष्ठान संपन्न हुआ। गत वर्ष पश्चिम बंगाल कोलकाता स्थित शक्तिपीठ काली मंदिर पर शतचंडी अनुष्ठान संपन्न हुआ था।गौरतलब हो कि नगर के प्रतिष्ठित व्यावसाई व जायसवाल समाज सेवा समिति जिलाध्यक्ष लालबहादुर जायसवाल व हरिलाल जायसवाल द्वारा काशी के प्रकांड वैदिक विद्वान आचार्य मथुरा प्रसाद शुक्ला की प्रेरणा से आज से 18 वर्ष पूर्व माता के सभी शक्तिपीठों पर शतचंडी अनुष्ठान का संकल्प लिया गया। इस संकल्प में जनपद के कोने-कोने से अन्य लोग भी जुड़ते गए और यह अनुष्ठान एक सामूहिक अनुष्ठान का स्वरूप अख्तियार कर लिया। इस अनुष्ठान में लालबहादुर जायसवाल, हरिलाल जायसवाल, प्रवीण जायसवाल, ईश्वर चंद्र जायसवाल, मनोज जायसवाल, संतोष जायसवाल, शशिदेव जायसवाल, राजेश राय, एडवोकेट अनिल पांडेय, प्रकाशचंद राय सहित 30 से अधिक परिवार जुड़ गए। जो लोग सपरिवार प्रतिवर्ष 10 दिनों तक शक्तिपीठ पर प्रवास कर अनुष्ठान में यजमान की भूमिका निभाते हैं। शक्तिपीठ के संबंध में प्रकाश डालते हुए आचार्य वैदिक मथुरा प्रसाद शुक्ल ने बताया कि महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी घाटी स्थित जनस्थान पर माता की ठोड़ी गिरी थी। यह स्थान नासिक रोड स्टेशन से लगभग 8 किलोमीटर दूर पंचवट क्षेत्र में स्थित है जिसे भद्रकाली शक्तिपीठ भी कहते हैं। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव है विकृताक्ष। ‘चिबुके भ्रामरी देवी विकृताक्ष जनस्थले।’ उन्होंने बताया कि कहते यह भी हैं कि भद्रकाली मंदिर ही शक्तिपीठ है। जहां सती का ‘चिबुक’ भाग गिरा था। अत: यहां चिबुक ही शक्तिरूप में प्रकट हुआ। इस मंदिर में शिखर नहीं है, सिंहासन पर नव-दुर्गाओं की मूर्तियां हैं, जिनके बीच में भद्रकाली की ऊंची मूर्ति है। इस्लामिक आक्रांताओं के कारण पहले गांव के बाहर पहाड़ी पर मूर्ति स्थापित कर दो मंजिला मंदिर बनाया परंतु उस पर कलश स्थापित नहीं किया ताकि कोई यह नहीं जान सके कि यह मंदिर है। इसी से इस पर शिखर नहीं है। 3 अगस्त से 9 अगस्त तक चल रहे इस अनुष्ठान के प्रमुख वैदिक आचार्य मथुरा प्रसाद शुक्ल ने बताया कि नाशिक में दो प्रमुख शक्तिपीठ हैं। एक सप्तशृंगी देवी मंदिर और दूसरी भद्रकाली मंदिर। सप्तशृंगी देवी मंदिर, जिसे सप्तशृंगी शक्तिपीठ भी कहा जाता है। जो नासिक से लगभग 65 किलोमीटर दूर वणी गांव में स्थित है। भद्रकाली मंदिर नासिक के पंचवटी क्षेत्र में स्थित है और इसे जनस्थान शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। इस अनुष्ठान का आयोजन भद्रकाली मंदिर पर किया गया है।
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