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गाजीपुर: अंतर्राष्‍ट्रीय सेमीनार के दूसरे दिन आदिवासी, भोजपुरी संस्‍कृति पर हुआ विचार-विमर्श

गाजीपुर। पी जी कॉलेज, राजकीय महिला पीजी कालेज एवं जीवनोदय शिक्षा समिति गाजीपुर के संयुक्त तत्वाधान में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आज दूसरे दिन  भी जारी रहा।  सेमिनार के प्रथम सत्र की अध्यक्षता पटना की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. ज्योत्स्ना प्रसाद ने किया। प्रो. संतोष कुमार सिंह ने भिखारी ठाकुर के माध्यम से भोजपुरी परंपरा-संस्कृति के बारे में अपने विचार रखे। प्रो. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने परंपराओं के विघटन, प्रत्याख्यान, और प्रत्यावर्तन के माध्यम से अपने विचार रखे। नेपाल से आये श्री शिवनंदन जायसवाल ने नेपाल में भोजपुरी परंपरा-संस्कृति पर प्रकाश डाला। छत्तीसगढ़ से आये डॉ. शंकर मुनि राय ने आदिवासी संस्कृति को काफी नजदीक देखकर अपने स्रोताओं को अभिसिंचित किया साथ ही आदिवासियों की कुछ अजीबोगरीब परंपराओं के बारे में भी बताया। अमेरिका से आये माइकल टी. बेनोलेक ने लोकगीतों के माध्यम से परंपरा-संस्कृति का पश्चिम दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया। सत्र के मुख्य वक्ता डॉ राकेश सिंह रहे। आपके अनुसार भाषा प्रवाहमान होती है इसलिए भोजपुरी भाषा  चिंता नहीं गर्व करने की बात है। इस दौरान प्रकृति सिंह एवं ज्योति सिंह ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया। डॉ. राकेश पाण्डेय ने इस सत्र संचालन किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उमा निवास मिश्र ने किया। कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर सविता भारद्वाज, श्री पृथ्वीराज सिंह एवं प्रोफेसर सरिता बुद्धू का उद्बोधन हुआ और अध्यक्षता काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर अनुप वशिष्ठ ने किया। प्रोफेसर सविता भारद्वाज ने अपसंस्कृति पर अपनी चिंता व्यक्त की। साथ ही साथ भोजपुरी एवं आदिवासी समाज की श्रम संस्कृति एवं सृजनशीलता की सराहना भी किया। आपके अनुसार हमारी लोक परंपराएं कभी धूमिल नहीं हो सकती। डॉ पृथ्वीराज सिंह ने भोजपुरी समाज एवं आदिवासी समाज के संपर्क में आने के कारण भाषा, खान-पान और परंपराओं के मिलन से उत्पन्न प्रभावो पर चर्चा की जबकि प्रोफेसर सरिता बुद्धु ने गिरमिटिया समाज के श्रम एवं सामूहिकता के कारण दास से सत्ताधारी बनने की गौरव गाथा को प्रस्तुत किया तथा सेमिनार के आयोजकों से इस क्षेत्र में नए-नए शोध करने की आवश्यकता पर बल दिया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर अनुप वशिष्ठ ने वर्तमान दौर के भाषा, संस्कृति एवं अस्मिता के संकट पर चर्चा की। आपके अनुसार सरकारे विस्थापन को बढ़ावा दे रही हैं। इस कारण आदिवासियो की बोली, खान-पान, पहनावा, रोजगार सब कुछ छूट रहा है। अब गांव में युवा नहीं है, सिर्फ वृद्धि बच्चे हैं। युवा पीढ़ी जहां है वहां रिक्तता है। आपके अनुसार लोक से पहले शास्त्र हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ शिवकुमार एवं सेमिनार की रिपोर्ट एवं आभार ज्ञापन डॉ रामनाथ तिवारी ने प्रस्तुत किया। इस दौरान डॉ जय सिंह की पुस्तक ‘शिक्षण कौशल’ का विमोचन सारस्वत अतिथियों द्वारा किया गया। इससे पूर्व सारस्वत अतिथियों का सेमिनार के संयोजक डॉ शेर खान, डॉ जितेंद्र राय, डॉ शशि कला जायसवाल, डॉ संतोष सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से डॉ सुशील तिवारी, डॉ प्रमोद श्रीवास्तव, डॉ अरुण प्रताप, डॉ घनश्याम कुशवाहा, एडीएम सिटी दिनेश कुमार आदि  सम्मानितगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंतिम चरण के रूप में लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिसमें गाजीपुर के कलाकारों की मुख्य भूमिका रही। इस अवसर पर बिटिया की विदाई नामक लोकनाट्य प्रस्तुत की गई तथा पवन बाबू के नेतृत्व में भोजपुरी कलाकारों ने शाम की रंगत जमाई।

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