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गाजीपुर: शिक्षक दिवस: केवल एक दिन नहीं, एक भावना- डा. प्रशांत

गाजीपुर। डा. प्रशांत ने बताया कि शिक्षक दिवस सिर्फ एक औपचारिकता या गुलाब के फूल देने का दिन नहीं है। यह एक प्रतीक है। यह उस सामाजिक ऋण और सम्मान को व्यक्त करने का दिन है जो हमें अपने गुरुओं के प्रति है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर मनाया जाने वाला यह दिवस हमें याद दिलाता है कि शिक्षक ही वह आधारशिला हैं जिस पर देश और समाज का भविष्य टिका होता है। लेकिन असली श्रद्धांजलि तब होगी जब यह सम्मान साल के 365 दिन दिखेगा, न कि सिर्फ 5 सितंबर को।

शिक्षक का कर्तव्य: सिर्फ पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं

एक शिक्षक का कर्तव्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना नहीं है। उसके कर्तव्य की व्यापक परिभाषा है:

  1. चरित्र निर्माण (Character Building): एक शिक्षक का सबसे बड़ा कर्तव्य छात्रों में अच्छे संस्कार, ईमानदारी, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करना है।
  2. जिज्ञासा जगाना (Igniting Curiosity): रटंत विद्या नहीं, बल्कि सीखने की ललक पैदा करना। सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना।
  3. सर्वांगीण विकास (Holistic Development): छात्र की बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक क्षमताओं को निखारना।
  4. एक मार्गदर्शक के रूप में (As a Mentor): सिर्फ एक विषय का जानकार नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों में मार्ग दिखाने वाला गाइड बनना।
  5. सामाजिक दायित्व (Social Responsibility): छात्रों में समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना, उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाना।

शिक्षक का मूल मंत्र: “आदर्श बनो, केवल पढ़ाओ मत”

शिक्षक का मूल मंत्र वही प्राचीन और सनातन सूत्र है: “गुरु दीक्षा देता है, गुरु शिक्षा देता है, और गुरु ही जीवन की राह दिखाता है।”

इसे आधुनिक संदर्भ में कहें तो:

  • “सीखने की प्रक्रिया में एक सहयोगी बनो।” (Be a facilitator in the learning process.)
  • “जो बोओगे, वही काटोगे।” छात्रों के साथ जैसा व्यवहार, अपेक्षा और विश्वास रखोगे, वैसा ही फल मिलेगा।
  • “अपडेट रहो।” जिस तरह दुनिया तेजी से बदल रही है, एक शिक्षक का अपने विषय और पढ़ाने की methodologies के साथ अपडेटेड रहना जरूरी है।

शिक्षक का अपना शिक्षकत्व और स्वयं की गरिमा

एक शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी उसका शिक्षकत्व (Teacherhood) और गरिमा (Dignity) है।

  • शिक्षकत्व: यह एक पहचान है, एक तपस्या है। इसमें धैर्य, त्याग, ज्ञान का भंडार और दूसरों का भला चाहने की भावना निहित है। यह तब कमजोर पड़ता है जब शिक्षक को महज एक “नौकरी” करने वाला मान लिया जाए।

गरिमा: शिक्षक का सम्मान समाज की नैतिकता का आईना है। इस गरिमा की रक्षा स्वयं शिक्षक, अभिभावक, छात्र और सरकार सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब एक शिक्षक की गरिमा को ठेस पहुँचती है, तो पूरी शिक्षा व्यवस्था की गरिमा घट जाती है।

आज के युग के बच्चों का शिक्षकों के प्रति व्यवहार: एक जटिल चुनौती

आज के बच्चे स्मार्ट, जागरूक और सवाल करने वाले हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन इसके साथ ही कुछ चुनौतियाँ भी सामने आई हैं:

अति-जागरूकता और अधिकारों का दुरुपयोग: बच्चे अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सजग हैं, लेकिन कई बार कर्तव्यों से अनभिज्ञ हैं। कुछ मामलों में यह “अभिभावक-शिक्षक-छात्र” संबंध को adversarial (विरोधी) बना रहा है।

  • सामाजिक मीडिया का प्रभाव: सोशल मीडिया ने बच्चों के आचरण पर गहरा असर डाला है। शिक्षकों के प्रति अनुचित टिप्पणियाँ, मिम्स बनाना आदि नए प्रकार की अनुशासनहीनता हैं।
  • अभिभावकों का रवैया: कई अभिभावक बच्चे की हर बात को सही मानकर सीधे शिक्षक पर आक्रमक हो जाते हैं, जिससे बच्चे के मन में शिक्षक के प्रति सम्मान खत्म होता है।
  • संवाद की कमी: पहले की तरह अब शिक्षक और छात्र के बीच व्यक्तिगत संवाद कम हो गया है। यह दूरी समस्या को और बढ़ाती है।

हल क्या है? इसके लिए तीन-स्तरीय दृष्टिकोण जरूरी है:

  1. शिक्षक को आधुनिक मनोविज्ञान समझना होगा और डिक्टेटर की जगह एक मित्र और मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होगी।
  2. अभिभावकों को शिक्षक के साथ सहयोग करना होगा, न कि उनके खिलाफ।
  3. छात्रों को यह समझाना होगा कि अनुशासन और सम्मान सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं।

देश में शिक्षकों पर प्राणघातक हमले: एक राष्ट्रीय शर्म और गंभीर चिंता का विषय

शिक्षकों पर हो रहे हिंसक हमले न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि एक सभ्य समाज के लिए शर्म की बात हैं। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि हमारे समाज में सहनशीलता, सम्मान और कानून का भय तेजी से खत्म हो रहा है।

  • कारण:
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण: शिक्षा एक “सेवा” न रहकर एक “व्यवसाय” बन गई है। छात्र/अभिभावक स्वयं को “ग्राहक” समझने लगे हैं जिसे “सेवा” का अधिकार है।
  • कानून में ढील: ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर कानूनी कार्रवाई का अभाव।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: शैक्षणिक संस्थानों में अनावश्यक राजनीतिक दखलंदाजी, जिससे शिक्षक की स्वायत्तता खत्म होती है।
  • सामाजिक मानसिकता का बदलाव: समाज में हिंसा को एक समस्या के ‘समाधान’ के तौर पर देखा जाने लगा है।
  • समाधान:
  • कठोर कानून: शिक्षकों के खिलाफ हिंसा के लिए विशेष और कठोर कानून बनाने की जरूरत है।
  • सुरक्षा व्यवस्था: स्कूलों और कॉलेजों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय।
  • सामाजिक जागरूकता: इस बारे में समाज में चर्चा शुरू करनी होगी कि शिक्षक पर हाथ उठाना सबसे निंदनीय कृत्य है।
  • संस्थागत सहायता: शिक्षकों को किसी भी दबाव या धमकी की स्थिति में तुरंत प्रशासनिक और कानूनी सहायता मिलनी चाहिए।

अंतिम विचार (Conclusion)

शिक्षक और समाज के बीच का रिश्ता एक sacred covenant (पवित्र वाचा) है। यह रिश्ता केवल कक्षा तक सीमित नहीं है; यह देश के भविष्य का निर्माण करता है। अगर इस रिश्ते में दरार आती है, तो नींव हिल जाती है। शिक्षक दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने शिक्षकों का न केवल सम्मान करेंगे, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और उपयुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए भी प्रयास करेंगे। क्योंकि एक सुरक्षित, सम्मानित और प्रेरित शिक्षक ही एक जिम्मेदार, सक्षम और संवेदनशील पीढ़ी का निर्माण कर सकता है।

 

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