वाराणसी। शोध संवाद समूह, भोजपुरी अध्ययन केन्द्र, बीएचयू के तत्वावधान एवं केन्द्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह के संयोजन में ‘किताब की बात’ श्रृंखला के तहत भोजपुरी सिनेमा साहित्य पर साहित्यकार मनोज भावुक द्वारा रचित ‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ पुस्तक पर परिचर्चा सह परिसंवाद का आयोजन किया गया। भारतरत्न पण्डित महामना मदनमोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और अतिथियों को भोजपुरिया गमछा प्रदान कर स्वागत करते हुए कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। स्वागत वक्तव्य देते हुए भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह ने बताया कि इस किताब की ख़ास बात यह है कि इसका पूरा लेखन भोजपुरी भाषा में हुई है। इसमें मनोज भावुक जी का मोटो है, ‘ई किताब भोजपुरी सिनेमा क इतिहास ना ह बल्कि भोजपुरी सिनेमा पर शोध करे वालन लोगन के खातिर एक रॉ मैटीरियल ह’ सिनेमा के साथ मनोज जी की बीस सालों की यात्रा रही है। भोजपुरी की व्याप्ति और बाज़ार व्यापक है। एक तरह से आज भोजपुरी सिनेमा संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, उस पर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता है जबकि यह पुस्तक भोजपुरी सिनेमा के क्लासिक युग को प्रस्तुत करती है। बड़े कलाकारों को रोज़गार उपलब्ध कराने में भी यह क्षेत्र बहुत सक्षमता से काम कर रहा है। लेखकीय वक्तव्य देते हुए बहुचर्चित कवि, लेखक, सिनेमा समीक्षक, फिल्म फेयर सम्मान से सम्मानित मनोज भावुक कहते हैं कि किसी भी लेखक के लिया बड़ा भावुक क्षण होता है जब उसके किताब पर बातचीत होती है। सिनेमा क जो निर्देशक बा उ विषयवस्तु के देखे ला कइसे ई सोचे के पड़ी अउर हमनी क इंडस्ट्री इपे सोच ना रहल बा। बनावल काहे जात बा, कउन उद्देश्य से बनावल जात बा। टीआरपी बटोरे के खातिर। मोदी जी ने कल ही व्याख्यान में माई शब्द का प्रयोग किया उसको लोग हाईलट करत बाड़न। ई चुनाव ने चॉकलेट थमावे जईसन बा। भोर के आस में जो बूढ़ भईल, सोचत बा सूरज कहां हेराइल, अंधेरा जाते नईखे। ई पुस्तक में संस्मरण भी बा। यहाँ एगो फ़िल्म के बजट एक करोड़ बा और उहवाँ पचास करोड़ बा। सिनेमा कैमरा से ना बने ला, कलम से ना लिखल जा ला बल्कि चेतना से, सोच से, अंतर्दृष्टि से लिखल जाला। सिनेमा खाली मनोरजंन अउर बाज़ार ही ना ह। कविता खाली दुइगो पंक्ति ना ह बल्कि उ आंदोलन के, बदलाव के हवा देवे वाला एक संबल भी बा। भोजपुरी फ़िल्म क प्रदर्शन बहुत गंदा ढंग से करत बाड़न। मॉरीशस अइसन देश बा जहाँ भोजपुरी कार्यक्रम क उद्घाटन प्रधानमंत्री कइलन, समापन राष्ट्रपति कइलन, संसार क भोजपुरी क प्रतिनिधित्व करे ख़ातिर भोजपुरी के प्रतिनिधि अईलन। अभी तक भारत देश क सरकार एगो कार्यक्रम बड़ स्तर पर कभो न करवलन। ‘दुनिया के स्वर्ग बनेउलें बिहारी, दुनिया उनके बनउलस भिखारी’ नामवर जी के मृत्यु से पहले नामवर जी का तीन खण्डों में मैंने इंटरव्यू लिया है तब उन्होंने कहा था, ‘अब त बहुत देर हो गईल, बूढ़ सुगा का पोस मानी’ वक्ता धीरेन्द्र कुमार राय ने कहा कि मनोज भावुक जी भोजपुरी साहित्य क धरोहर बाड़न। उ मनोज भावुक जईसन आदमी ही होई जो करेजा के हिला देवे के शक्ति रखेलना। अपने भोजपुरी माई खातिर उ इंग्लैड क नौकरी छोड़ देलन। जीवन में कोई क अंगूरी थमनी आप त माई भोजपुरी क थमनी। पहली फिल्म आईल ‘ए माई गाँव छूटल जाता’ भोजपुरी हमनी के माई भाषा बाटिन। ई किताब क भी ससुरा यहीं बा। ससुरा में मुँह दिखाई भयल। संजोग बनल बा आज। 1900 से लेके 1962 तक क काल लेवल गयल बा अउर 1962 से 1967 तक के समय लेके लिखल गयल बा। 2019 तक क भोजपुरी सिनेमा क यात्रा बा इमे। संवाद पर, पटकथा पर, व्यक्ति पर, तीर्थ से लेके जा, भोजपुरी सिनेमा में देशभक्ति, भोजपुरी सिनेमा में सास, भोजपुरी सिनेमा में सम्बन्ध क ताना बाना सब कुछ बा। 1950 में इह देश में भाषा के लेके अलग अलग राज्य बनावे शुरू भईल। आज़ादी के समय सब लोग राष्ट्र के प्रति एक रहे। तीन व्यक्ति दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी अउर आज के समय में नरेंद्र मोदी बड़ा योगदान बाटे। आज दक्षिण में सांसद के हिन्दी में बोले के पड़त बा। एकर राजनीति अर्थ न लेवल जाय। जब लगभग 1954-55 में पाथेर पांचाली बना था तब हिंदी भाषियों ने कहा था कि यह क्षेत्रीय भाषा में बनी फिल्म भारत की ग़रीबी को बेचने का माध्यम है और यहीं से हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का संघर्ष शुरू हुआ। बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं है। इससे पहले ‘दुई बीघा ज़मीन’ बन चुकल रहल। विमल दा ‘गंगा मईया तोहे चुनरी चढ़ाईब’ बनावे खातिर उद्योग कईलन। जब ई फ़िल्म प्रदर्शित भईल तब एक साल तक बैलगाड़ी पर बइठके देखे अईलन। इतना भारी संख्या में कोई फ़िल्म इतना दर्शक ना जुटा पईलन। उ समय बिहार, झारखंड अउर छत्तीसगढ़ एके में रहल। भोजपुरी क पहिला किताब न हिन्दी में छपल न भोजपुरी में बल्कि पेंगुइन से अंग्रेजी में छपल। 63 साल में पहली बार भोजपुरी में तीन खण्ड में किताब प्रकाशित करल गयल बा। 1977 में एगो रंगीन फ़िल्म बनल ‘दंगल’ और ओकर मिज़ाज भी रंगीन होखे लगल। ईमा भिखारी ठाकुर ‘बिदेसिया’ गइले रहलन। भोजपुरी फ़िल्म में ई रंगीनी अइसन चमकदार रूप धारण कईलस त आँखें चौंधिया गइल। संस्कार गीत, सम्बन्ध, लोक, परम्परा क्षीण हो गइल। एक बार फिर प्रयास शुरू भईल सईयाँ हमार और ससुरा बड़ा पईसा वाला से थोड़ा प्रगति कईलस। आज भोजपुरी इंडस्ट्री में हीरो भोजपुरी बा, भाषा भोजपुरी बा, क्षेत्र भोजपुरी बा लेकिन काम करे वाला भोजपुरी क ना हन। 2005 के बाद से भोजपुरी फिल्म में आपन लोक परंपरा, लोक संस्कृति, लोकगीत क्षीण होत गयल। सरकारी स्तर पर भी बहुत कम प्रयास करल जात बा। पिछले बीस सालों में जितना किताबों को सम्मान से किया गया है उसका सम्बन्ध लोक से है। बेंडिट क्वीन और दामुल जईसन फ़िल्म भोजपुरी में बने के चाही। 2025 में जब ई किताब के पूरा करी त भोजपुरी के नेता लोगन क ज़िक्र ज़रूर करी। आज तक भोजपुरी क नेता लोगन भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में ना शामिल करा पईलन। भोजपुरी में भी नागरी प्रचारणी सभा हिंदी क शब्दकोश जईसन शब्द आवे लागी तब हिंदी अउर समृद्ध होई। नाही त अंग्रेजी क हाथ पांव जईसे बन रहल बा त हिन्दी भी क्रियोल भाषा बन जाई। आभार ज्ञापन डॉ. विश्वमौली ने किया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्रा शिवांगी सिंह कर रही थी। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक तीन खण्डों में है।
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