वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में गीता समिति द्वारा ‘रविवासरीय गीता प्रवचन’ के सत्रारंभ रविवार को मालवीय भवन सम्पन्न मे सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण वेद विभाग के छात्रों द्वारा कुलगीत व भजन गायन संगीत एवं मंच कला संकाय के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह प्रवचन प्रत्येक रविवार को प्रातः 10:00 बजे से 11:30 बजे तक आयोजित होता हैं एवं पूरे शैक्षणिक सत्र में इसकी निरंतरता बनी रहती है। महामना मालवीय जी का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का विकास भी आवश्यक है। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय में ‘रविवासरीय गीता प्रवचन’ की परंपरा प्रारंभ की थी। उनका मानना था कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों एवं सिद्धांतों से उनका परिचय आवश्यक है यह विचार प्रो.हृदयरंजन शर्मा ने व्यक्त किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलसचिव श्री राजन श्रीवास्तव ने कहा कि आज के युग में भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति विद्यार्थियों में रुचि बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि नवप्रवेशी विद्यार्थियों के इंडक्शन कार्यक्रम में गीता से संबंधित आयोजन को भी शामिल किया जाए, ताकि उनमें प्रारंभ से ही भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति जुड़ाव विकसित हो सके। उन्होंने कहा कि गीता के माध्यम से मन को संस्कारित करने और जीवन-मूल्यों को सुदृढ़ करने का प्रयास आवश्यक है।मालवीय भवन के मानित निदेशक प्रो. पतंजलि मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ती भौतिक प्रतिस्पर्धा और तनाव के कारण व्यक्ति अनेक प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक कष्टों से जूझ रहा है। गीता समिति के सचिव प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान-परंपरा का अमूल्य ग्रंथ है, जो मनुष्य को कर्तव्य, आत्मसंयम एवं सदाचार का मार्ग दिखाता है। महामना नें समस्त विश्व विद्यालय परिवार से सप्ताह में डेढ घण्टा प्रत्येक रविवासर को गीता प्रवचन में सम्मिलित होने के लिए (समय-दान )अपने लिए गुरु दक्षिणा के रुप में देने के लिए अपील की थी। मुख्यातिथि परम श्रद्धेय सद्गुरु माधव प्रियदास जी, अध्यक्ष, स्वामीनारायण गुरुकुल, गुजरात, अहमदाबाद ने अपने उद्बोधन में गीता के अध्ययन, मनन और उसके अनुसार जीवन जीने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए अहं की भावना का त्याग कर विनम्रता एवं आत्मसंयम के साथ जीवन जीने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बाहरी ज्ञान से परिचित कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति को उस ज्ञान को ग्रहण करने योग्य बनाना भी है। उन्होंने भगवान विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार त्रिविक्रम ने तीन पगों में समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया, उसी प्रकार गीता जैसे विराट विषय को सीमित शब्दों में समेटना कठिन है। उन्होंने यह भी कहा कि विषयों को समझे बिना उनका विवेचन संभव नहीं है और इसी दृष्टि से गीता के संदेश पर विचार करना आवश्यक है। कार्यक्रम का संचालन भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. शारदिंदु कुमार त्रिपाठी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन गीता समिति की संयुक्त सचिव प्रो. सुमन जैन ने किया। कार्यक्रम में प्रमुख रुप से प्रो.राजाराम शुक्ल,प्रो.उदय प्रताप शाही,डाॅ.अर्चना शाही,प्रो.सुनील कात्यायन;प्रो प्रो.वी के. मिश्रा,प्रो.मृत्युंजय देव,प्रो लल्लन मिश्र,प्रो.सदाशिव द्विवेदी,प्रो.प्रद्युम्न शाह सिंह,प्रो.विजय शंकर शुक्ल,डाॅ.उषा शुक्ल,डाॅ.प्रभात सिंह,प्रो.मुकुट मणित्रिपाठी,प्रो.राजकुमार मिश्र,डाॅ.शन्ना लाल मौर्या,डाॅ.मारकण्डेय राम पाठक,प्रो.डी.के.मिश्र,प्रो.कमलेश झा,प्रो.लता शर्मा,प्रो.रुद्र प्रकाश मलिक डाॅ.कृष्णानन्द सिंह,डाॅ.सिद्धि दात्री भारद्वाज डाॅ.आशा शर्मा,आदि विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के गणमान्य शिक्षकगण, कर्मचारीगण, शोधार्थी तथा विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।
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