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शिक्षक दिवस पर विशेष: तब अब के शिक्षक और शिक्षा!

उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

गाजीपुर। मैंने गाज़ीपुर शहर के एक नामचीन कालेज मे पढ़ाया है. वहाँ अंग्रेजी भाषा का लेक्चचर था. कालेजों मे अनेक उतार चढाव देखे हैँ. कुछ खट्टे कुछ मीठे अनुभव मिले. 1969 से 1988 तक सवं छात्र था. उस समय से शिक्षा जगत मे अनेक उतार चढ़ाव हुए. पहले के समय मे शिक्षक शिक्षा क्षेत्र मे जो एक मानक दे गए हैँ, उसी को आज हम शिक्षक तथा छात्रों मे ढूंढ़ते हैँ. सड़क पर पैदल आते यादो शिक्षक पर नजर पद गई तो हम जैसे छात्र साइकिल से उतर कर खड़े हो जाते थे. करीब आने पर सलाम करते. आगे वह बढ़ जाते तो हमलोग फिर चढ़कर साइकिल से आगे बढ़ते थे. उनके कपडे भी बड़े सलीके के होते थे और हम छात्रों को भी साफ सुथरा कपडे पहनने को कहा करते थे. पीटी विषय मे इसपर भी नंबर मिलता था। हमारे समय मे एक शिक्षिक को समाज का आदर्श माना था. ज़ब कोई शिक्षक किसी सामारोह मे या किसी आयोजन मे शरीक होता तो लोग उनका आदर से खडे होकर स्वागत करते थे. यदि कोई किसी के घर आ जाये तो लोग धन्य होजाते. हमारे समय मे शिक्षा के साथ संस्कार एक साथ दिए जाते थे. अब केवल शिक्षा दी जाती है, संस्कार कोसो दूर हो गया. वस्तुतः शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों की आंतरिक क्षमताओं को अंकुरित करना था जो पहले से उनमे मौजूद होता था. हालांकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में इतनी उन्नति के बाद भी यह गुण वर्तमान शिक्षा प्रणाली से गायब है। यह समय वर्तमान शिक्षा प्रणाली में व्याप्त दोषों को पहचानने का है और आधुनिक शिक्षा को बदलने की ज़रूरत है. परिवर्तनकारी शिक्षा का अर्थ है छात्र में निहित प्रतिभा के सर्वश्रेष्ठ, उदात्त और श्रेष्ठतम को बाहर निकालना है. व्यक्तित्व विकास, जिसमें आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान शामिल है, आवश्यक है. चिंतनशील सीखने की प्रक्रिया का पालन करके एक शिक्षक में रूपांतरित हो जाता है. इस प्रकार, वे अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक रोल मॉडल बन जाते हैं. जीविकोपार्जन, जीवन जीने और जीवन जीने में अंतर है। समय बदल गया है. हमारे जमाने के अध्यापको से बच्चे डरते थे. अधिकतर के हाथ मे डँडा रहता था. बहुत से तो बीच मे ही डरकर पढाई छोड देते थे. पैरेन्ट्स भी शिकायत मिलने पर कहते थे दो ही डँडे क्यो लगाये चार लगाना चाहीये था। आज उलटा हो गया है. अब कही कही तो अध्यापक ही डरने लगे है. आज अध्यापक पेशेवर हो गये है. हाथ का डँडा गायब, माता पिता सब कुछ बरदार्शत कर सकते है लेकीन लाडले की पिटाई कदापि नही. अगर गलती से किसी टीचर ने एक या दो थप्पड जड भी दिया तो समझो मुसीबत मोल ले ली बल्कि कही कही तो ये बात सुखींयां बन जाती है बल्कि उसे जेल भेज दिया जाता है. अब सब से बढ़कर एक मास्टर के जिम्मे इतने काम सौंप दिया जाता है कि उसके समझ मे यह नहीं आता कि पढ़ाया स्कूल मे कैसे जाया जाए ऊपरी सरकारी काम कैसे किया जाए।

उस्ताद होना उतना आसान नहीं!

वे शिक्षक थे

पूरी व्यवस्था के अधीक्षक थे

फिर भी पढ़ाते रहे !

जनगणना सर्वे कराते हुए

वोटर आईडी कार्ड बनाते हुए

चुनाव-उपचुनाव में व्यवस्था निभाते हुए

पोलियो की दो बूंद  पिलाते हुए

वे पढ़ाते रहे !

अँगूठा छापों के मातहत रहकर

लचर व्यवस्था के मूक दर्शक बनकर

शिक्षा का फैलता कारोबार देखकर

वे पढ़ाते रहे !

नाम लिखवाने को

किस्मत चमकवाने को,

समाज बदलवाने को,

देश गढवा़ने को,

वे पढ़ाते रहे!

कभी बिन कुर्सियों के ,

कभी टूटी कुर्सियों पर,

कभी नीम बुखार में,

कभी गला खराश में,

वे पढ़ाते रहे !

मन में ऊँचे ख्वाब लेकर,

टिफिन में रोटी-दाल लेकर,

शिक्षा का हाल बेहाल देखकर,

सिर पर टोपी,

गले में गमछा, रुमाल लेकर,

वे पढ़ाते रहे !

कभी तंग कमरों में,

कभी बिन कमरों के,

कभी बाग में,

कभी गाँव में,

कभी टीन में,

कभी टप्पर में,

कभी शहर में,

कभी छप्पर में,

कभी टाट पर,

कभी ठाट में,

कभी सूट में,

कभी बूट में,

वे पढ़ाते रहे!

कभी छतरी लेकर,

कभी बैनर लेकर,

कभी माईक पकड़कर,

कभी डिजिटल होकर,

वे पढ़ाते रहे!

बाबुओं की डाँट सुनकर,

प्रिंसिपलों से मिली फटकार चुनकर,

अभिभावकों की पहनाई औकात गुनकर,

छात्रों के दिए उपनाम पहनकर

वे पढ़ाते रहे !

घंटा लगने से पहले,

घंटा लगने के बाद,

घंटे के बीच में,

बिन घंटे के,

बिन टंटे के,

वे पढ़ाते रहे !

कभी डाक्टर को,

कभी कलक्टर को,

कभी सीए को,

कभी इंजीनियर को,

वे पढ़ाते रहे !

असैंबली में,

रिसैस में,

छुट्टी के बाद,

त्यौहारों में,

व्यवहारों में,

सैमिनारों में,

पंचायत की चौपालों में,

भीड़ भरे बाजारों में,

वे पढ़ाते रहे !

सितार पर,

मीनार पर,

अंकों के बवाल पर,

रंगों से भरे सवाल पर,

धरती के बिगड़े हाल पर,

दुनिया की टेढ़ी चाल पर,

इंसानी फितरत के जाल पर,

वे पढ़ाते रहे!

संग खड़िया के,

ट्विटर चिड़िया पे,

ब्लैक  बोर्ड पर,

पोडियम मोड पर,

वे पढ़ाते रहे!

अपने घर में,

पड़ोस के घर में,

नेता के घर में,

अभिनेता के घर में,

चपरासी को,

मंत्री को,

संतरी को,

वे पढ़ाते रहे!

क्योंकि उन्हें विश्वास था कि एक दिन जब

सब पढ़लिख जाएंगें ,

शायद उस दिन वे एक पूरे दिन की छुट्टी

वेतन सहित , स-सम्मान पाएंगें !

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