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गाजीपुर: धान की फसल में कीटों एवं रोगों से नुकसान के लक्षण और नियंत्रण

गाजीपुर। धान  हमारे देश की प्रमुख खाद्यन्न फसल है और धान की फसल में सबसे अधिक किटों एवं रोगों से नुकसान पहुँचता है। धान में कीटों  के प्रकोप से उपज के साथ-साथ गुणवत्ता भी बहुत प्रभावित होती है, जिसके कIरण किसानों को धान की फसल का मनोवांछित मूल्य नहीं मिल पाता और उनको भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है , इसको ध्यान में रखते हुए आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र अंIकुशपुर, गाजीपुर के मृदा वैज्ञानिक डॉ0 दीपक प्रजापति एवं कृषि अभियांत्रिक वैज्ञानिक डॉ0 पंकज कुमार ने प्रक्षेत्र भ्रमण के दौरान किसानो  को अवगत कराया कि धान में लगने वाले रोगों के लक्षण एवं कीटो से नुकसान एवं निदान से अवगत कराते हुए बताया जैसे कि पत्ति लपेटक कीट की सुंढ़ी कोमल पत्तियों को किनारे की तरफ से लपेटकर सुरंग बनाकर उसमें अंदर खाती रहती है I फलस्वरूप पौधों की पत्तियों का रंग उड़ जाता है और पत्तियां सूख जाति हैI  इसका लक्षण सबसे ज्यादा अगस्त से अक्टूबर माह तक परिलक्षित होता है और इसके नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफॉस (36 डब्ल्यू ए0सी0 ) 600 मि0ली0 200 से 250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें I क्लोरोपाइरीफॉस 2.5 मि0ली0 प्रति लीटर पानी में मिलकार छिड़काव करना सार्थक होगा I तनाछेदक कीट अपनी सुंढ़यो से नुकसान पहुचाती है तथा यह फूलों के सहद पर निर्वाह करती हैI  इसके प्रभाव से पोधे प्रारंभिक अवस्था में ही सूख जाते है और बालियां सफेद दिखाई देने लगती हैं I प्रकाश प्रपंच के प्रयोग से तनIछेदक की संख्या पर नियंत्रण किया जI सकता है I कार्बोफुरान या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या फ़िप्रोनिल 0.3 जी 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करने  पर नियंत्रित हो सकता हैं I टिड्डा कीट धान के पत्तों को खाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे जानवरों ने चरा हो, इसके नियंत्रण  हेतु गर्मी के समय धान के खेतों के मेढ़ो क़ी खुरचाई करने से इनके अण्डे नस्ट हों जाते हैं और इनकी संख्या कम होने लगती है I इसके रोगथाम के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई0सी0 या क्विनोलफॉस  25 ई0सी0 2.5 मि0ली0 प्रति लीटर  की दर  से छिड़काव करे I कार्बारिल या मिथाइलपैराथियान पाउडर 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुरकाव करने से धान की फसल सुरक्षित हो जाती है I धान में खैरा रोग जिंक तत्व की कमी से होता है I  पत्तियां पहले नीचे से पीली होने लगती है नई पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे और धारियां विकसित हो जाती है, जो पुरानी पत्तियों को पूरी तरह से ढक लेती हैं और उत्पादन में 25% की कमी के साथ-साथ  लक्षण दो तीन सप्ताह बाद परिलक्षित होता है I इसकी रोकथाम  हेतु जिंक सल्फेट 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़   मिट्टी में रोपाई /बुवाई के पूर्व छिड़काव करें I भूरा धब्बा – इस रोग में पत्तियों पर गहरी कत्थई रंग के गोल/ अंडे जैसा  धब्बे बन जाते हैं, धब्बों के चारों तरफ पीला घेरा बन जाता है तथा मध्य भाग पीलापन लिए कत्थई  रंग का  हो  जाता है I  इसके  रोकथाम  हेतु मैन्कोजेब  75% ई 0सी0  200 मिली 0  लेकर  200 से 225 लीटर  पानी में घोलकर खड़ी फसल में छिड़काव करें I शीथ ब्लाईट (शाकाणु झुलसा)- पत्र केंचुल  व तनों पर अनियामित आकार के धब्बे बनते हैं, जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का हो जाता है और पत्तियों पर घेरादार  धब्बे बनते है I वैलिडैमाइसिन1-1.25 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इस बीमारी का निदान हो सकता है I जीवाणु झुलसा  (बैक्टीरियल ब्लाईट) – पत्तियों नॉक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती हैं, सूखे हुए किनारे पर अनियामित एवम  टेढ़ी मेढ़ी  संरचना बन जाती  हैं I 2 से 3 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90% +टेट्रासाइक्लिन  हाइड्रोक्लोराइड 10% को 200 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड पाउडर लेकर 200 से 225 लीटर पानी में घोल  बनIकर प्रति  एकड़  छिड़काव  करने से इस रोग का निदान संभव है I सफेदा रोग-  पौधों में लोहा तत्व की कमी के कारण अधिक प्रभाव पड़ता है I  इसमे पत्तियाँ सफेद रंग की निकलती हैं जो कागज के समान फट जाती है इसके उपचार के लिए दो से तीन किलोग्राम फेरससल्फेट प्रति एकड़  में एक से डेढ़ किलोग्राम बुझे हुए चूने अथवा 8 से 10 किलोग्राम यूरिया के साथ मिलकर छिड़काव  करने से इस रोग के लक्षण समाप्त हो जाएगे Iझोका रोग – इस रोग में पत्तियों पर आंख की आकृति के धब्बे बनते हैं ,जो मध्य में राख के रंग तथा किनारे गहरे कत्थई  रंग के होते हैं, पतियों के अतिरंजित बालियों ,  पुष्प,  शाखाएं एवम गांठों पर काले धब्बे बनते हैं I कंडुवा रोग – इसमे बालियाँ के कुछ दIने पीले, सुनहरे या भूरे रंग के पाउडर में बदल जाते हैं, जो बाद में काले हो जाते हैं I इसके उपचार के लिए कार्बेन्डाजिम  पाउडर  200 ग्राम 200 से 250 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ छिड़काव  करें I किसान भाईयों से यह भी आग्रह है कि धान के नर्सरी डालने से पहले बीज का शोधन जरूर करें, इसमे 3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें, जिससे बीज जनित, मिट्टी जनित और कवक से होने वाली बीमारी प्रारंभिक चरण में ही नष्ट किया जा सके और धान की उपज में बढ़ोतरी हो सके।

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