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क्रिटिकल केयर हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है: अमित घोष

लखनऊ। क्रिटिकल केयर हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है। यूपी में क्रिटिकल केयर को पूरी तरह से ट्रांसफाउंड करना होगा तो वह हमारे गवर्नमेंट आर्डर से नहीं हो सकेगा। इसके लिए हमें पार्टनरशिप भी करनी होगी। सारे स्टेक होल्डर को लाना होगा। हमें प्राइवेट और सरकारी जितने भी मेडिकल कॉलेज हैं, उनको संयुक्त रूप से लेकर चलना होगा। इसके अलावा लीडिंग हास्पिटल को साथ लेना होगा। क्रिटिकल केयर लोगों को मुहैया कराने में अभी हमें बहुत लंबा सफर तय करना है। पालिसी मेकिंग में इन सभी बातों पर मंथन चल रहा है। यह बातें अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा अमित कुमार घोष ने कही। वे शनिवार को एरा यूनिवर्सिटी में प्रथम नेशनल कान्फ्रेंस ऑफ नर्सिंग इमरजेंसी, क्रिटिकल केयर एंड ट्रॉमा एलाइड रिस्पांडर(नेक्टर) में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। इस मौके पर एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।अपर मुख्य सचिव ने कहा कि यदि रोगी को तुरंत इलाज मिल जाए तो हम उसके जीवन को बचा सकते हैं। सेप्टम और नेक्टर का इसमे अहम रोल है। उन्होंंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल ये है कि एम्बुलेंस में पेशेंट को कैसी केयर मिल रही है? एम्बुलेंस सिस्टम से लेकर रोड एक्सीडेंट तक हम कैसे काम कर सकते हैं? इस पर मंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा ये देखा गया है कि रोगी समय पर ट्रॉमा सेंंटर नहीं पहुंच पाता है। पहुंचता है तो उसे वेंटीलेटर नहीं मिल पाता है। घंटों वो एम्बुलेंस में पड़ा रहता है। आसपास के लोग इलाज के लिए यहां आना चाहते हैं। अपर मुख्य सचिव अमित घोष ने कहा कि हम पालिसी मेकिंग में इन सभी समस्याओं का समाधान तलाशते हैं। उन्होंने कहा कि आज पैरामेडिकल स्टाफ की रेगुलर प्रशिक्षण की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार सिस्टम को डेवलप करने की दिशा में लगातार कोशिश कर रहा है। यूपी में क्रिटिकल केयर को बेहतर करने के लिए उन्होंने पार्टनरशिप पर जोर दिया। कहा कि इसके लिए सारे स्टेड होल्डर को लाना होगा। इंटेसिव केयर वाले प्राइवेट को साथ लाना होगा। उन्होंने कहा कि यूपी में 81 मेडिकल कॉलेज हैं और इसमें 41 सरकारी हैं। बाकी प्राइवेट सेक्टर में है। इसके अलावा लीडिंग हास्पिटल है। यूपी के 60 जिलों में 81 मेडिकल कॉलेज हैं। 73 जिलों में 15 जिले ऐसे भी हैं जहां पर हमारे पास इंटेसिव केयर की सुविधा पर्याप्त नहीं है। वहां गांवों में कोई इमरजेंसी होती है तो क्या केयर मिलेगी? कब तक मिलेगी? फस्र्ट रिस्पांडर कब पहुंचेगा? पालिसी मेकर में इन सब बातों पर बात होती है। मेडिकल कॉलेज से बात करते हैं। क्रिटिकल केयर को लोगों को मुहैया कराने के लिए अभी हमे बहुत लंबा रास्ता तय करना है। इस मौके पर एरा यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अब्बास अली महदी ने कहा कि संस्थान टीचर्स ट्रेनिंग, रिसर्च और चिकित्सा में अपना अहम रोल अदा कर रहा है। संस्थान बहुत ही न्यूनतम रेट पर चिकित्सा उपलब्ध करवा रहा है। कई तरह के कोर्स चल रहे हैं। ओपीडी में रोज करीब 3000 मरीज देखे जाते हैं। इस मौके पर एरा यूनिवर्सिटी के प्रो चांसलर मीसम अली खान भी मौजूद थे।सचिव समान्य प्रशासन जुहैर बिन सगीर ने कहा कि ऐसी कोई नर्सिग रेगुलेटरी बॉडी होनी चाहिए जो पैरामेडिकल की ट्रेनिंग परफारमेंस, और उनकी कार्यशाली की मॉनीटरिंग कर सके और उसी अनुसार उनकी ट्रेनिंग कराए। उन्होंने कहा कि एक ऐसा सेंट्रल पोर्टल बनना चाहिए जिस पर क्रिटिकल केयर से सम्बंधित जानकारी साझा हो सके। जैसे अगर कोई सडक़ हादसे में घायल होता है तो उसकी सूचना तत्काल उसके परिजनों तक पहुंच सके। उन्होंने ये भी कहा कि किसी भी दुर्घटना स्थल पर एम्बुलेंस समय से तो पहुंच जाती है, लेकिन मरीज बच नहीं पाता। ऐसे में एम्बूुलेंस में तैनात कर्मियों को इस बात की ट्रेनिंग होनी चाहिए कि वो मरीज को किस स्तर के असप्ताल में पहुंचाए ताकि उसकी जान बच सके। ऐसी अवस्था में गोल्डन ऑवर काफी महत्वपूर्ण होता है। वहीं एरा विश्वविद्यालय के अतिरिक्त निदेशक ज़ॉ अली खां ने कहा कि पैरामेडिकल की कार्यक्षमता को बढ़ाना चाहिए। ताकि वो डॉक्टर की गैरमौजूदगी में मरीज की केयर कर सकें। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में तकनीकी के इस्तेमाल को बल देते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि बहुत बड़े स्तर पर तकनीक का इस्तेमाल करें। छोटी- छोटी तकनीक भी मेडिकल क्षेत्र मे बड़ा योगदान दे सकती है। अगर तकनीक नहीं है तो मेडिकल क्षेत्र के साथ नाइंसाफी होगी। पैनल में सैकटम के अध्यक्ष डॉ. लोकेंद्र गुप्ता और डॉ. राकेश कुमार गोरिया भी शामिल थे जिन्होंने पैरामेडिकल के सशक्तिकरण को लेकर अपने सुझाव दिए।

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