वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग एवं अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के संयुक्त तत्त्वावधान में 28 से 30 जुलाई, 2026 तक ‘नयी चाल की हिन्दी’ विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महामना सभागार, मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में स्वागत वक्तव्य एवं विषय-प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजकुमार ने कहा कि नामवर सिंह के बिना कोई भी अकादमिक विमर्श पूर्ण नहीं हो सकता। उनसे सहमति या असहमति व्यक्त की जा सकती है, किन्तु उन्हें दरकिनार करके हिन्दी का कोई भी गंभीर बौद्धिक विमर्श आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने कहा कि वे हिन्दी के थे सिर्फ़ हिन्दी नहीं थे। भारतीय और पाश्चात्य दोनों ज्ञान-परम्पराओं पर उनका समान अधिकार था, जिन विद्यार्थियों को नामवर सिंह को कक्षा में सुनने का अवसर मिला, वे ही बता सकते हैं कि एक आदर्श अध्यापक कैसा होता है। मुख्य वक्ता आई.ए.सी.एल.एल.एस. के पूर्व सचिव प्रो. हरीश त्रिवेदी ने कहा कि हिन्दी के तीन मानक वक्ता महादेवी वर्मा, अज्ञेय और नामवर सिंह को सुनकर यह अनुभव होता था कि हिन्दी भाषा की अभिव्यक्ति-क्षमता कितनी व्यापक और समर्थ है। उनके अनुसार, नामवर सिंह की बहुभाषिकता और ज्ञान के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में थी। उन्होंने विभिन्न भाषाओं से ज्ञान और विचार ग्रहण किए, परंतु अपनी भाषिक अस्मिता और वैचारिक स्वतंत्रता को सदैव अक्षुण्ण रखा। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भाषा का स्वभाव निरंतर गतिशील रहने का है; वह कभी ठहरती नहीं, बल्कि समाज के साथ सतत प्रवाहित होती रहती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में व्हाट्सऐप, एसएमएस और ई-मेल जैसे त्वरित संचार माध्यम भाषा के सामने नई चुनौतियाँ उपस्थित कर रहे हैं, जिनका उसके स्वरूप और प्रयोग पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सकारात्मक एवं रचनात्मक उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया। कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने डिजिटल युग में साहित्य की महत्ता को रेखांकित किया। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. विवेक सिंह और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. नीरज खरे ने किया। द्वितीय सत्र को नामवर स्मरण सत्र के रूप में रखा गया था । द्वितीय अकादमिक सत्र के मुख्य वक्ता एवं संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा प्रयुक्त ‘हिन्दी नई चाल में ढली’ का आशय केवल भाषिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज, ज्ञान और आधुनिक चेतना के व्यापक रूपांतरण का संकेत था। प्रो. अग्रवाल ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय विद्रोह अपने आप में एक प्रगतिशील राजनीतिक प्रक्रिया थी, जिसमें एक नए प्रकार के भारतीय राष्ट्र की कल्पना आकार ले रही थी। प्रो. अग्रवाल ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आलोचनात्मक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए कहा कि सांप्रदायिक तनावों के दौर में भी शुक्ल जी ने जायसी की परंपरा को प्रेम, संवाद और मानवीय सहअस्तित्व की दृष्टि से देखा। प्रो. मनोज कुमार सिंह ने नामवर जी पर बोलते हुए कहा कि बनारस ने उन्हें बहुत ही आत्मीयता से अंगीकार किया। उन्होंने नामवर के विरह विदग्ध चित्त की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए मेघदूत के यक्ष और परिंदे की लतिका का संदर्भ उद्धृत किया। उन्होंने कहा की उनकी सहृदयता का उक्ष उनके जीवन से आवासी जुड़ता है। उनकी प्रस्थान लेती हुई प्रवृत्तियाँ हैं जो उन्हें महत्त्वपूर्ण आलोचक बनाती हैं। आई.आर.एस. अधिकारी शैलेश कुमार ने नामवर सिंह के साथ अपने आत्मीय संबंधों का स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व से जुड़ी अनेक संस्मरणात्मक घटनाएँ साझा कीं। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह का व्यक्तित्व जितना विद्वत्तापूर्ण था, उतना ही सहज, आत्मीय और मानवीय भी था। प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार तथा तद्भव के संपादक अखिलेश ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ईदगाह के संदर्भ में नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि नामवर सिंह ईदगाह को मात्र मनोवैज्ञानिक कहानी नहीं मानते थे, बल्कि उसे प्रेमचंद की सबसे महत्त्वपूर्ण और गहन मानवीय कहानियों में से एक मानते थे। उन्होंने नामवर सिंह के उस कथन को रेखांकित किया कि “सौन्दर्य वही है, जो हमारे अस्तित्व की रक्षा कर सके।” हिन्दी के किसी भी सृजनात्मक लेखक में नामवर जी लोक जीवन में सबसे अधिक जाने जाते हैं। तृतीय सत्र में आरंभिक आधुनिक काल पर चर्चा हुई, जिसमें टेक्सॉस विश्वविद्यालय की गुंजन मल्होत्रा ने ‘हिंदवी प्रेमाख्यान परंपरा और पेम नेम:एक सांस्कृतिक अध्ययन’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया तो वहीं कुमार नीरज ने ‘समयसुन्दर की कुसुमांजलि की बहुभाषिकता और मुग़ल-राजपूत दुनिया में जैन तीर्थ’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। भारतीय भक्ति चेतना:औपनिवेशिक पूर्वाग्रह और प्रस्थान’ पर बातचीत करते हुए प्रो. माधव हाड़ा ने कहा कि भारतीय भक्ति आंदोलन यूरोपीय पुनर्जागरण से मूलतः भिन्न है और इसकी जड़ें भारतीय सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपराओं में निहित हैं। उन्होंने सिद्ध, नाथ, बौद्ध, पंचसखा, वारकरी, शेख फरीद, कबीर और मीराबाई जैसी परंपराओं का उल्लेख करते हुए भक्ति की निरंतरता को रेखांकित किया। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने आरंभिक आधुनिक हिन्दी साहित्य पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास-लेखन में स्रोतों का आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भक्ति आंदोलन भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की स्वाभाविक देन है और इसे केवल यूरोपीय दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। साथ ही उन्होंने भक्ति परंपरा को सामाजिक समानता, मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त आधार बताया। शैक्षणिक संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र में ‘विश्वविद्यालय की अवधारणा’ पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें प्रमुख विद्वानों ने अपने शोधपरक विचार रखे। सत्र के दौरान डी. वेंकट राव ने ‘विश्वविद्यालय की भारतीय परिकल्पना’, संजय कुमार ने ‘नालंदा और हुम्बोल्ट से आगे: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और आधुनिक विश्वविद्यालय की भारतीय पुनर्कल्पना’ तथा स्वाति गांगुली ने ‘ज्ञान की एक वैकल्पिक परंपरा की तलाश में: विश्व भारती और उसका हिन्दी भवन’ विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। भारतीय शिक्षा दर्शन, ऐतिहासिक संदर्भों और वैकल्पिक ज्ञान परंपराओं पर हुए इस सफल विचार-विमर्श के पश्चात सत्र का समापन चाय पर सौहार्दपूर्ण संवाद के साथ हुआ। इस अवसर पर नामवर सिंह के शिष्य शैलेश कुमार की पुस्तक ‘चंद तस्वीर-ए-बुताँ’ (नामवर जी का जीवन – तस्वीरों के आईने में) का विमोचन हुआ। संगोष्ठी के अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। तीन दिनों तक आयोजित विभिन्न अकादमिक सत्रों में हिन्दी भाषा, साहित्य, संस्कृति, आलोचना, अनुवाद, लोकपरम्परा, मीडिया तथा डिजिटल युग में हिन्दी के बदलते स्वरूप से जुड़े विविध विषयों पर शोधपरक विमर्श किया जाएगा।
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