लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में आज दिनांक 28/07/2026 को प्रख्यात साहित्यकार एवं हिन्दी के अप्रतिम आलोचक नामवर सिंह के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक गरिमामय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने की।अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. पवन अग्रवाल ने नामवर सिंह को हिन्दी आलोचना का जनतांत्रिक एवं लोकतांत्रिक स्वर बताते हुए कहा कि उनकी आलोचना-दृष्टि ने हिन्दी साहित्य को नई वैचारिक दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने साहित्य को समाज, संस्कृति और समय के व्यापक संदर्भों में देखने की दृष्टि विकसित की, जो आज भी समान रूप से प्रासंगिक है।कार्यक्रम का मुख्य वक्तव्य प्रो. सूरज बहादुर थापा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने नामवर सिंह की समग्र साहित्यिक दृष्टि, आलोचना-पद्धति तथा भारतीय साहित्यिक परंपरा में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही, उन्होंने नामवर सिंह से जुड़ी अनेक संस्मरणात्मक घटनाओं को साझा करते हुए उनके व्यक्तित्व की सहजता, विद्वत्ता और गुरु-स्वरूप को उपस्थित जनों के समक्ष जीवंत कर दिया।कार्यक्रम की संयोजिका प्रो. रीता चौधरी ने अपने संबोधन में नामवर सिंह को एक आदर्श गुरु, संवेदनशील चिंतक और प्रेरणास्रोत के रूप में स्मरण किया। उन्होंने उनके साहित्यिक एवं बौद्धिक अवदान को नमन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।इस अवसर पर विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. हिमांशु सेन, प्रो. श्रुति, प्रो. अलका पाण्डेय, डॉ. राहुल पाण्डेय, डॉ. अनुपम पटेल, डॉ. आकांक्षा, डॉ. सीमा यादव तथा डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह सहित विभाग के अनेक शिक्षक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विभाग के छात्र-छात्राओं एवं शोधार्थियों ने भी बड़ी संख्या में सहभागिता की। विभिन्न वक्ताओं ने नामवर सिंह की वैचारिकी, आलोचना-दृष्टि तथा हिन्दी साहित्य में उनके बहुआयामी योगदान पर अपने विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों को नामवर सिंह के साहित्यिक व्यक्तित्व एवं उनके बौद्धिक अवदान को नए परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर प्रदान किया।
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